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वन प्रबंधन में जेएफएम समितियों की भूमिका

भारत सरकार द्वारा 1990 में संयुक्त वन प्रबंधन के संबंध में सामर्थ्यकारी दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बाद से भारत में संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) वन प्रबंधन की आधारशिला बन चुका है। इन दिशा-निर्देशों को वनों की रक्षा करने, उनका उपयोग करने तथा प्रबंधन करने के मामले में समुदायों की भूमिका को बदलते परिप्रेक्ष्य में लागू किए जाने के व्यापक प्रयास के तौर पर देखा गया  है, जैसा कि राष्ट्रीय वन नीति, 1988 में कहा गया है। राज्यों द्वारा संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रमों के मामले में अपने दिशा-निर्देशों का ही पालन किया जाता रहा है। मार्च 2006 तक 28 राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह संघ राज्य क्षेत्र में लगभग 22 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र का प्रबंधन करने के लिए 1,06,482 जेएफएम समितियां बन चुकी थीं। जेएफएम समितियों के गठन तथा उन्हें सक्रिय बनाने के कार्य में तेजी लाने हेतु नवम्बर 2004 में राष्ट्रीय वानिकी कार्यक्रम (एनएपी) में जेएफएम समितियों को मजबूत बनाये जाने की दृष्टि से एक नया संघटक जोड़ा गया।

चुनौतियां और बाधाएं

जेएफएम के कार्य में तेजी आने के साथ ही नई चुनौतियां भी उभरकर सामने आ रही हैं। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जेएफएम समितियों का गठन किया गया है ताकि समय पर निधि का वितरण करने के साथ ही इस संबंध में लोगों के अन्दर सक्रिय और नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया जा सके। माइक्रोप्लान के अन्दर सम्मिलित विभिन्न गतिविधियों के विपरीत जेएफएम समितियों की भूमिका मुख्य रूप से वन लगाने, उनकी रक्षा करने तथा कुछ मामलों में मृदा और जल संरक्षण के कार्यों तक सीमित कर दी गई। अन्य कार्यों, उदाहरण के लिए ग्रामीण विकास विभाग जैसी विभिन्न एजेन्सियों द्वारा कार्यान्वित किए जाने वाले कार्यों या स्थानीय स्तर पर पेयजल की आपूर्ति किए जाने में जेएफएम समितियों को लगाए जाने हेतु योजना बनाने की जरूरत है। इसके अलावा, जहां बड़ी संख्या में जेएफएम समितियों को जिम्मेदारी सौंपी गई, वे सौंपे गए वनों की रक्षा करने और उनका पुनरूद्धार करने में सफल रही हैं। वहीं कार्य योजना और वन प्रबंधन व्यवहारों में अनुसंधान कार्य करने की काफी संभावना है जिससे वनों के प्रबंधन और उनके उपयोग में जेएफएम समितियों की जरूरतों और उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है। इससे जेएफएम समूहों में शामिल विभिन्न स्थानीय स्टेकहोल्डरों, उन वनों-खंडों जिनकी रक्षा वे लोग कर रहे हैं, से ही सीधे बायोमास और अन्य पर्यावरणीय सेवा लाभ प्राप्त करने में मदद मिल सकती है और उससे वनों की रक्षा करने हेतु स्थानीय प्रोत्साहनों को बढ़ावा मिल सकता है।

निगरानी और मूल्यांकन दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वनों या समुदायों पर जेएफएम के प्रभाव, भागीदारी आदि का स्वरूप और सीमा आदि के संबंध में और अधिक नवीन सूचना उपलब्ध कराया जाना जेएफएम प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है। उदाहरण के लिए, लैंगिक आधार पर सहभागिता के मामले में एकत्रित आंकड़े यह दर्शाते हैं कि इसके लगभग आधे सदस्य महिलाएं हैं। हालांकि, क्या उनकी यह सदस्यता जेएफएम समितियों की प्राथमिकताएं निर्धारित करने में महिलाओं के निर्णय को महत्व देती भी हैं अथवा नहीं, यह अभी भी एक प्रश्न बना हुआ है। उसी प्रकार से पर्याप्त संसाधनों की उपलब्धता, कार्यक्रम की संपोषणीयता, क्षमता निर्माण, तकनीकी आदान, आगे के सम्पर्क और संस्थापक अन्तर्विरोध से संबंधित मुद्दे भी सामने हैं।

प्रगति की राह

भारत में जेएफएम लगभग 27 वर्षों से चल रहा है और सभी राज्यों ने इसे अंगीकृत कर लिया है। मार्च 2006 के आंकड़े वर्ष 2005 के आंकड़े की तुलना में जेएफएम समितियों की संख्या  में 6614 की वृद्धि तथा 577583 हेक्टेयर क्षेत्रों की वृद्धि दर्शाते हैं। प्रारंभ में केवल वन क्षेत्रों में ही जेएफएम समितियों के गठन पर जोर दिया जाता था, लेकिन इन बीते वर्षों में बहुत सारे राज्यों – बिहार, कर्नाटक, मणिपुर, मिजोरम, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने गैर-वन क्षेत्र के गांवों में भी जेएफएम समितियां गठित की हैं। ये समितियां सड़क के किनारे तथा सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण का प्रबंधन करती हैं।

सबसे अधिक जेएफएम समितियां पूर्वी और मध्य भारत में गठित की गई हैं। जबकि जेएफएम के अधीन वन आच्छादन पश्चिमोत्तर क्षेत्र की तुलना में दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में तीन गुना अधिक है। ऐसा इन प्रदेशों में वन क्षेत्रों के अन्दर स्वामित्व के विशिष्ट पैटर्न के कारण हो सकता है। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय वानिकी कार्यक्रम (एनएपी) के अधीन वन विकास एजेंसी (एफडीए) के माध्यम से जेएफएम समितियों को वित्तीय सहायता प्रदान की गई। तथापि, यह बताना महत्वपूर्ण है कि सभी जेएफएम समितियों को एफडीए के अधीन शामिल नहीं किया जा सका है। कुल 106482 जेएफएम समितियों में से केवल 24,244 जेएफएम समितियों, जो कुल 922,806 हेक्टेयर वन क्षेत्र का प्रबंधन कर रही हैं, को एनएपी के अधीन वित्तीय सहायता मिल पायी है। पूर्वोत्तर राज्यों, (सिक्किम, नागालैंड और मणिपुर) और गोवा की लगभग शत प्रतिशत जेएफएम समितियों को एफडीए के अधीन कर लिया गया है। अन्य राज्यों में बिहार, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में एफडीए का अच्छा नेटवर्क है।

जेएफएम समितियों में लगभग 58 प्रतिशत पुरूष हैं। 2005 में जेएफएम सदस्यों में लिंग अनुपात पुरूषों के पक्ष में झुका हुआ था, अगले वर्ष महिलाओं के पक्ष में सुधार दिखा और महिलाओं की संख्या 32 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत हो गई। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जारी किए गए जेएफएम दिशा-निर्देशों में इन वर्षों के अन्दर जेएफएम समितियों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करके विभिन्न सामाजिक समूहों को सशक्त बनाने पर जोर दिया जाता रहा है।

दीर्घकालीन परिसम्पत्तियों का निर्माण : वन क्षेत्र के अधिकतर गांव सुदूर में स्थित होते हैं तथा आमतौर पर उनमें परिवहन, पेयजल, शिक्षा, सिंचाई सुविधाएं आदि जैसी नागरिक और आर्थिक सुविधाओं का अभाव रहता है। इसलिए इन गांवों की ओर से दीर्घकालीन परिसंपत्तियों के निर्माण किए जाने की साझी मांग की जाती रही है और विभिन्न स्तरों पर इन समस्याओं का समाधान करने की कोशिश भी हुई है। सभी प्रमुख दानकर्ता (डोनर) समर्थित परियोजनाओं में ग्रामीण विकास संघटक को प्रमुख स्थान दिया गया है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में विश्व बैंक द्वारा समर्थित मध्य प्रदेश वानिकी परियोजना इसके ग्राम संसाधन विकास कार्यक्रम (वीआरडीपी) के माध्यम से ग्रामों के समग्र विकास की जरूरतों को पूरा करती है। इस निवेश के पीछे तर्क यह है कि नये पौधों को जानवरों से बचाने के लिए खाई आदि खोदने, बाड़ लगाने आदि पर खर्च करने की बजाय समुदाय के लोग सामाजिक प्रतिबद्धता के माध्यम से इन वन क्षेत्रों की रक्षा करेंगे और बचाई गई यह धनराशि वीआरडीपी के माध्यम से कहीं अधिक उत्पादनकारी निवेश के लिए उपलब्ध हो सकेगी। इस धनराशि का निवेश सिंचाई अवसंरचना (बांधों को बांधना, कुंओं और पम्पसेटों), मृदा संरक्षण उपायों, विद्यालय और सामुदायिक भवनों, कृषि आदानों (जैसे बीज, उर्वरकों) और बागवानी आपूर्ति के लिए किया गया। रेशम कीटपालन, मशरूम की खेती और मधुमक्खी पालन जैसी आय सृजन गतिविधियों में प्रशिक्षण भी दिया गया। इस धनराशि का उपयोग बायोगैस संयंत्रों और ऊर्जा दक्षता से पूर्ण चूल्हों जैसी ईंधन की बचत करने वाली प्रौद्योगिकीयों को बढ़ावा देने के साथ ही ईंधन की लकड़ी तथा चारे के पौधे लगाने पर किया गया। 17 प्रतिशत जेएफएम समितियों को वर्तमान में द्विपक्षीय बहुपक्षीय एजेंसियों से सहायता मिल रही है। विश्व फूड कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी), हरियाली योजना, जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए), जनजाति विकास योजनाओं संशोधित दीर्घकालीन कार्ययोजना (उड़ीसा के केवीके जिले) का इस प्रयास को सफल बनाने में उपयोग किया जा रहा है।

अन्य लाभों के मामले में, जेएफएम समितियों के सदस्यों को सबसे अधिक लाभ सवैतनिक रोजगार पाने का मिला है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों में इमारती लकड़ी तैयार करने/वृक्ष की कटाई से होने वाले लाभ को जेएफएम समिति के सदस्यों के बीच वितरित किया गया है। जेएफएम समितियों की संख्या बढ़ाये जाने हेतु राज्य स्तर पर नीतिगत पहलें की गई हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने 2007 में जेएफएम प्रकोष्ठ का पुनगर्ठन किया था। यह प्रकोष्ठ वन संरक्षा/पारिस्थिकी विकास समितियों और एफडीएएस के कार्यकरण को अंजाम देने वाले जेएफएम की स्थिति की अर्द्धवार्षिक समीक्षा करेगा। यह नई गतिविधियों और परियोजनाओं की संभावना तलाशने तथा योजना बनाने का भी कार्य करेगा।

अगला कदम- उन क्षेत्रों में अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं जिनमें अन्य क्षेत्रों के साथ सम्पर्क स्थापित किए गए तथा रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए गए। वन क्षेत्रों में गरीबी घटाने और आर्थिक विकास करने के लिए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि यह जेएफएम की सफलता को दर्शानेवाली प्रक्रिया बनी रहेगी।

स्वच्छता और स्वास्थ्य- ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता सुविधाओं की खराब स्थिति का दुष्प्रभाव स्पष्ट दिखता है। बीमारी, निम्न स्तर के कार्य, मानव गरिमा का अपमान और लाखों व्यक्तियों की मृत्यु समुचित स्वच्छता सुविधाओं से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं। महिलाएं और बच्चें सबसे अधिक पीड़ित होते हैं। अब इस बात पर जोर दिया जाने लगा है कि जेएफएम के अधीन वनों के स्वास्थ्य को मानव अधिवासों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाना चाहिए। अतः स्वच्छतः एवं स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को माईक्रो योजना का भाग बनाए जाने की जरूरत है तथा सुरक्षित पेयजल को जेएफएम गतिविधियों में लोगों के अन्दर विश्वास पैदा करने वाले उपाय के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।

जेएफएम के लिए अन्य सम्पर्क- विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार ने बांस से संबंधित उत्पादों के मूल्यवर्धन, समुचित प्रौद्योगिकी विकास तथा उत्पादों के वाणिज्यीकरण से जुड़ी विस्तृत गतिविधियों को पूरा करने की दृष्टि से राष्ट्रीय बांस अनुप्रयोग मिशन (एनएमबीए) की स्थापना की है। इसके अन्तर्गत विभिन्न उत्पाद विकसित किए गए हैं जिनमें छत निर्माण सामग्री, प्लाईवुड सब्सटीट्यूट, ग्लास फाइबर कम्पोजिट फ्लोरिंग, फर्नीचर और पार्टीकल बोर्ड आदि शामिल हैं। बांस आधारित  उद्योग पूरे देश भर में स्थापित किए गए हैं। इन प्रसंस्करण इकाइयों के साथ सम्पर्क करने से रोजगार के अवसर तथा उत्पादों के लिए सुनिश्चित बाजार पैदा हो सकते हैं। निर्माण में इनमें से कुछ नए उत्पादों के प्रयोग के मामले में जेएफएम समिति के सदस्यों को भी प्रशिक्षण दिये जा सकते हैं और इस प्रकार से निर्माण में स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्ची सामग्री के उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है तथा स्थानीय रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं।

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