भूगोल और आप | भूगोल और आप फ्री आर्टिकल

भू-आकृति विज्ञान अर्थात भौगोलिक संरचनाओं का अध्ययन

भौगोलिक परिवर्तनों के कारण पृथ्वी की सतह पर निर्मित होने वाली विभिन्न प्रकार की आकृतियों, इनकी संरचना के लिए होने वाली विभिन्न प्रकियाओं, उच्चावच तथा स्थलीय स्वरूपों की स्थापना सम्बन्धी कारणों का अध्ययन भू-आकृति विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है। इसकी उपयोगिता भूगोल, पुरातत्व विज्ञान, भू-अभियांत्रिकी विज्ञान, तकनीकी भू-अभियांत्रिकी, भू-ज्यामिति आदि विषय क्षेत्रों में है।

पृथ्वी पर प्राकृतिक परिवर्तन सम्बन्धी अनेक प्रकार की प्रक्रियाएं होती हैं। समुद्र में ज्वार-भाटा का आना और परिणामस्वरूप  निक्षेपों का तट पर एकत्र होते जाने से लैगून अथवा वेलांचल की निर्मिति, नदियों में बाढ़ आने से इनके तटीय क्षेत्रों में रेत अथवा मिट्टी के टीले बन जाना, नदियों के समुद्र में गिरने के स्थान पर डेल्टाओं की निर्मिति, ज्वालामुखी विस्फोट के कारण आग्नेय शैलों के शीतल हो चुकने के उपरान्त धरातल की सतह पर विभिन्न आकार की स्थलाकृतियों की संरचना, भूस्खलन तथा भूकम्प के कारण धरातल की सतह पर दिखने वाले बदलाव और उच्चावच में परिवर्तन, नदियों की अपवाह प्रणाली एवं इनमें होने वाले परिवर्तन तथा इनके कारण स्थलीय भूमि के स्वरूप व आकारिकी का बदलना, मरुभूमि की उत्पत्ति तथा विस्तार, पर्वतों का उद्भव एवं चट्टानों की निर्मिति आदि के कारणों का अध्ययन भू-आकृति विज्ञान के द्वारा किया जाता है।

मानचित्रण की कला एवं इसकी उपयोगिता

भू-आकृति विज्ञान विषय से सम्बद्ध भू-वैज्ञानिक भूमि निरीक्षण, भौगोलिक पर्यवेक्षण तथा संख्यात्मक संयोजन के द्वारा धरातल पर होने वाले परिवर्तनों का पूर्वानुमान लगाते हैं। वे यह समझने का प्रयास करते हैं कि अध्ययन हेतु चयनित भू-आकृति का इतिहास क्या है तथा इसकी गतिकीय प्रभावशीलता क्या है। भू-आकृति विज्ञान से जुड़े हुए जो नाम सबसे पहले सामने आये, वे हैं – लियोनार्डो दा विंची, जेम्स हट्टन, दिमारेस्त, बफन आदि। संभवतः विंची प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि अपरदन प्रक्रिया के परिणामस्वरूप नदी अपनी घाटी का निर्माण स्वयं करती है।

स्कॉटलैंड निवासी जेम्स हट्टन आधुनिक भू-आकृति विज्ञान के जन्मदाता कहे जाते हैं। पृथ्वी के इतिहास में चक्रीय व्यवस्था का सिद्धान्त हट्टन ने ही प्रतिपादित किया था। 19वीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों में भू-आकृति विज्ञान सम्बन्धी आधुनिक विचारधाराओं का प्रसार यूरोप स्थित जर्मनी व यूनाइटेड किंगडम तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ। अमेरिकी वासी जे. डब्ल्यू. पावेल ने पठारों एवं पर्वतों का अध्ययन किया और भू-आकृति विज्ञान की कई महत्वपूर्ण परिकल्पाएं प्रतिपादित की। स्थलीय आकृतियों की संरचना का आधार उनके भूगर्भीय स्वरूपों को मानने के अतिरिक्त पावेल ने नदियों के विभिन्न प्रकार के विभाजन सम्बन्धी सिद्धान्त प्रतिपादित किये।

भू-आकृति विज्ञान सम्बन्धी अध्ययन 19वीं शताब्दी के अंत तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक 20 वर्षों में आपने विकास के चरम पर पहुँचे। इस अवधि में डेविस का कार्य सर्वाधिक एवं महत्वपूर्ण रूप में सामने आया। स्थलाकृतियों के विकास में चक्रीय व्यवस्था का अवलोकन करके इनकी तीन विकास व्यवस्थाएं डेविस ने सामने रखीं। 1. युवावस्था, 2. प्रौढ़ावस्था, 3. वृद्धावस्था। अपरदन चक्र की अंतिम अवस्था को डेविस ने ‘पेनीप्लेन’ अर्थात समप्राय मैदान का निर्माण कहा। इस विषय के बारे में वारसेस्टर का कथन है, ‘‘भू-आकृति विज्ञान पृथ्वी के उच्चावचों का व्याख्यात्मक वर्णन है।’’ जबकि ब्लूम का कहना है कि भू-आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों एवं उनमें बदलाव लाने वाली प्रक्रियाओं का क्रमानुसार वर्णन और विश्लेषण है।

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*