भूगोल और आप | भूगोल और आप फ्री आर्टिकल |

विश्व तापन के बढते हॉट स्पॉट्स एवं इसके वैश्विक आपदाकारी प्रभाव

इक्कीसवीं सदी के मौसमी बदलाव तीव्रता से विश्व तापन में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) की चपेट में आ रहे हैं। विगत सदी में मानवीय गतिविधियाँ इतनी पर्यावरण विपरीत रही हैं कि आज दुनिया का तापमान बढ़ रहा है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव मौसमी तंत्र पर पड़ रहा है। दुनिया के सम्पूर्ण जीव जगत सहित मानव भी इस परिवर्तन से अत्यधिक प्रभावित हो रहा है। इस संबंध में इन्टरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ( आई.पी.सी.सी) तथा इण्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिरियोलॉजी पुणे ने स्पष्ट किया है कि तापमान बढ़ने से बाढ़ए सूखा तथा तापीय लहरों की जैसी आपदाओं की आवृत्ति चरम पर होगी। साथ ही कृषिए जैवविविधताए हिमनदए जलसंसाधन आदि प्रभावित होंगे।

हाल ही में  “ नेचर “  पत्रिका ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका में चक्रवातों (हरिकेन) की बारम्बारता का बढ़ना भी विश्व तापन का ही परिणाम है तथा इससे चक्रवातों की बारंबारता एवं शक्ति में वृद्धि हो रही है। इस वर्ष ऐसे ही अनेक विश्लेषण प्रकाशित हो चुके हैं जिसका सारांश यही है कि अब वैज्ञानिक विश्व तापन को मौसमी बदलावों के लिए पूर्णतया जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसीए नासा के न्यूयार्क स्थित गोडार्ड अंतरिक्ष अध्ययन संस्थान के नूतन शोध में बताया गया है कि अब लगातार अल निनो जैसी स्थितियाँ बनेंगी तथा अल निनो को विश्व तापन को मापने का एक मानक बताया। ऐसा आज हम महसूस भी कर रहे हैं।

बढ़ते तापमान के कारण मानसून में दोलन आने की आशंकाएं अब वास्तविकता में बदलने लगी हैं। गत वर्ष पूर्वाचंल में वर्षा की प्रवृत्ति अलग रही जबकि राजस्थान के शुष्क भागों में एक शताब्दी बाद ऐसी वर्षा देखी गई। इसका कारण मौलिक न हो कर सामयिक मौसमी बदलाव है जो विश्व तापन के कारण मानसूनी दोलन से उद्भूत हुआ है। इस तरह की प्रवृत्ति भारत में बड़ी आपदाओं को जन्म देगी। आज से एक मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी का तापमान आज के औसत तापमान से एक डिग्री सेल्सियस अधिक था जो समय के साथ कम हुआ तथा अब उसी स्तर की ओर जा रहा है। वर्तमान में पृथ्वी के धरातल का औसत तापमान 100 सेल्सियस व सागरीय पर्यावरण का औसत तापमान 17ण्20 सेल्सियस है। जबकि . सम्पूर्ण पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 150 सेल्सियस है। तापमान में अल्पकालीन परिवर्तनों का सिलसिला पिछले 2000 वर्षों से चल रहा है । सन् 900 से 1300 तक का समय उच्च तापन का रहा था, इसके बाद सन् 1450 से 1850 तक का समय कम तापमान का रहा लेकिन इसके बाद पुनः तापमान बढ़ना चालू हुआ तो 21 वीं शताब्दी में अपने चरम पर है। विगत तीन दशकों से हर दशक में भू-सतह का तापमान 0.20 सेल्सियस बढ़ा है इसके लिए मुख्य रूप से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जिम्मेदार है।

विश्व तापन से आज सम्पूर्ण पृथ्वी संकट में है लेकिन कुछ स्थान लम्बे समय से संतुलित पारिस्थितिकी दशाओं वाले रहे हैंए जो आज तापमान बढ़ने से पड़ने वाले प्रभावों के कारण संकटमय हैं। वैज्ञानिकों ने ऐसे स्थलों को विश्व.तापन के हॉटस्पॉट्स कहा है। दुनिया में आज ग्लोबल वार्मिंग या विश्व तापन के बीस हॉट स्पॉट्स ;विश्व तापन के चरम प्रभाव वाले क्षेत्रद्ध को चिन्हित किया गया है। इनमें उत्तरी अमेरिका में ग्रीन लैण्ड रॉकीज पर्वत अलास्का व टेक्सास प्रमुख हैं। ग्रीनलैण्ड की हिमपरत तेजी से पतली होती जा रही है। अलास्का तथा रॉकीज पर्वत के हिमनद पिघल रहे है। टेक्सास में तापीय लहरें प्रभावित करती है दूसरी ओर वेनेजुऐला में 1982 में 6 हिमनद थे जिनमें से वर्तमान में केवल 2 बचे हैं जो आगामी 10 वर्षों में समाप्त हो जायेंगे। हिम पिघलने से  सागर तल बढ़ रहा है जिससे हवाई द्वीप के पुलिन (बीच) खतरे में हैं। आर्कटिक महासागर की हिमपरत प्रतिदशक सात प्रतिशत की दर से घट रही है। साईबेरिया विशाल टुण्ड्रा क्षेत्र की स्थायी हिम (पर्माफ्रास्ट) पिघल रही है। ऐसा माना जा रहा है कि आगामी शताब्दी में आधे हिमनद पिघल जायेंगे। अफ्रीका के प्रसिद्ध पर्वत किलीमंजारो ;तंजानिया की हिम भी सन् 2020 तक समाप्त हो जाऐगी।

एशिया एवं ओशेनिया में हिम पिघलने के साथ ही सागर तल बढ़ने से तटीय क्षेत्र संकट में है। तिब्बत, गढ़वाल हिमालय एवं नेपाल के हिमनद पिघल रहे हैं। चीन के टिएनशान पर्वत के हिमनद एवं भारत का गंगोत्री सर्वाधिक संकट में है। हिम पिघलने से सागर तल में उत्थान हो रहा है जिससे चीनए फिजी एवं बांग्लादेश के तटीय भाग डूबमय है। इसके अलावा सिचेलिस मॉरिशसए श्रीलंका ग्रेट बैरियर रीफ आदि मूंगा (प्रवाल) क्षेत्रों का अस्तित्व सागर तल बढ़ने से खतरे में है। बांग्लादेश का लगभग अठारह हजार एकड़ मेंग्रोव वन क्षेत्र डूबमय है। ग्लोबल वार्मिंग के इन हाटॅस्पाट्स के स्थानीय प्रभावों के अतिरिक्त अनेक विश्वव्यापी प्रभाव भी परिलक्षित होंगे जिनका सामना वर्तमान पीढ़ी को करना पड़ेगा। सागर तल में उत्थान होने से हिन्द महासागर भूमध्यसागर अफ्रीकी अटलांटिक महासागर तथा कैरीबियन सागर के तटीय भागों के नगरीय आवास जलमग्न हो जायेंगे। यह केवल पुरजोर संभावना नहीं है वरन् इसके प्रमाण आज दुनिया में परिलक्षित होने लगे हैं। एक ओर जहाँ वर्षों का संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र अवक्रमित हो रहा है वहीं चरम मौसमी घटनायें अपना प्रभाव दिखाकर विश्व तापन के प्रभावों की सत्यता दर्शा रही हैं।

प्रकृति में एक तंत्रीय व्यवस्था होती है जिसके द्वारा विभिन्न परिचालन में तापमान ऊर्जा का कार्य करता है चाहे वे तंत्र जैविक हो या फिर अजैविक। यदि इन तंत्रों को एक बार अवनयित कर दिया जाता है तो मानव के अनेक प्रयासों से भी ये शीघ्र संतुलित नहीं हो पाते हैं। ये तंत्र परस्पर अन्तनिर्भर एवं अन्त संबंधित होते हैं। जिस कारण इनके प्रभाव भी वैश्विक होते हैं।

आज दुनिया भर से प्राप्त हो रहे ऐसे परिणामों पर प्रबन्धन की सोच को नजरन्दाज कर कुछ  प्रतिनिधि देश उन पर राजनीति कर रहे हैं। यद्यपि इनका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से कमोबेश प्रभाव उन पर भी पड़ रहा है लेकिन वे जानते हैं कि परिवर्तन के जो चक्र चल पड़े हैं उन्हे एकाएक नियंत्रित कर पाना मुश्किल है , इसलिए उनके लिए उत्तरदायी देश ढूंढ लेते हैं तथा अपने दुष्परिणामों के लिए विकासशील देशों को यह कहकर उत्तरदायी ठहरा देते हैं कि उनका विकास नियोजित न होने से ऐसा हुआ है ।  जबकि वास्तविकता यह है कि अमेरिकी टीम के देश दुनिया को उष्णता की ओर ले जा रहे हैं। ग्रीन हाउस गैसों का सर्वाधिक उत्सर्जन यहीं होता है। ऐसे में दुनिया के विकासशील देशों को अपनी नियोजित रणनीति बनाकर एक मंच पर आना चाहिए ताकि इस मानव जनित विनाश से बचा जा सके।

 

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.