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जैव ईंधन प्रदाता जटरोफा

वैज्ञानिक और व्यवहारिक परीक्षणों से साबित हो चुका है कि जटरोफा पौधे के बीजों से सस्ते गुणवत्तायुक्त जैव ईंधन का उत्पादन किया जा सकता है। जटरोफा पौधा भारत में बंजर भूमि पर भी आसानी से उगने वाले तिलहन वर्ग के बीज जैव ईंधन यानी जैव डीजल बनाने के लिए उपयोगी है।

साढ़े तीन किलो जटरोफा बीज से एक लीटर जैव ईंधन बन सकता है। योजना आयोग ने देश भर में उपलब्ध 13 करोड़ हेक्टेयर बंजर भूमि में से 3.3 करोड़ हेक्टेयर में रतनजोत की खेती को चिन्हित किया है। अगर जैव ईंधन विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों  से तैयार किया जाए तो भारत अपनी जरूरतों का 10 प्रतिशत ईंधन खुद तैयार कर सकता है और इससे 20 हजार करोड़ रूपये के बराबर विदेशी मुद्रा की बचत मुमकिन होगी। जैव ईंधन तेल की कुल मात्रा में से कम से कम 10 प्रतिशत का विकल्प बन सकता है।

जटरोफा विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है, यहां तक की बंजर भूमि में भी। राजस्थान के मरूस्थलीय क्षेत्र में भी इसे सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है। बंजर भूमि में बोने से भूमि का कटाव भी रूकेगा और इसका सदुपयोग भी होगा।

भारत और चीन की अर्थव्यवस्था के तेज विकास को देखते हुए यहां इसी रफ्तार से ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। भारत में ऊर्जा की प्रति व्यक्ति खपत, अमेरिका, जापान और चीन की तुलना में कम है, लेकिन हम अपनी आबादी के लिहाज से इस खपत को दो गुना कर दें तो, देश को काफी अधिक मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होगी।  ज्यों-ज्यों जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ेगा इसके दामों में कमी आयेगी।

भारत अपनी जरूरतों का 70 प्रतिशत तेल विदेशों से आयात करता है और 2020 तक 100 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से मंगवाना पड़ेगा। लेकिन अगर जैव ईंधन को बढ़ावा दिया जाये तो हर साल दो अरब रूपये के बराबर विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। जैव ईंधन का मतलब है, इथेनाॅल जैसे केमिकल, जो गन्ने या खास तरह के पौधों से तैयार होते हैं और जिन्हें पेट्रोल या डीजल के साथ मिलाया जाता है – जेटरोफा , सूरजमुखी, पाम आॅयल, करंजिया और चावल भूसी आदि से बायो – डीजल बनाने पर देश में पहले से ही शोध चल रहा है।

 

चमत्कारी पौधा – जटरोफा

योजना आयोग के पूर्व सदस्य डी.एन. तिवारी की अध्यक्षता में गठित जैव ईंधन विकास समिति की सिफारिशों के आधार पर बायो-डीजल पर एक राष्ट्रीय मिशन शुरू किया गया है। इस नेशनल मिशन के अन्तर्गत अनुसंधान और विकास के अलावा पौधा रोपण, बीज प्राप्त करना, तेल निकालने, मिश्रण करने तथा बिक्री जैसे सभी पहलुओं को सम्भाला जाएगा।

जटरोफा, यूफोर्व – आइएसीआ, कुल का पौधा है। यह अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में बहुतायत से पाया जाता है। भारत में जैव ईंधन बनाने के लिए जिन 32 पौधों की पहचान की गई है उनमें जटरोफा का स्थान सबसे ऊपर है, इसके कई कारण है –

*  इनके बीजों में 40-58 प्रतिशत तक तेल होता है, जबकि अन्य में 33 प्रतिशत से कम तेल पाया जाता है।

* इन पौधों की परिपक्वता अवधि 1-2 साल होती है जबकि अन्य पौधों जैसे – नील, करंज और जोजोबा की 5-10 साल होती है।

* यह अधिकतम 50 सेंटीग्रेट के तापमान को सहन कर लेता है। अतः 15-50 सेमी वर्षा वाले क्षेत्र में भी जीवित रह सकता है।

* समुद्र तल से लगभग 1500 मीटर ऊँचाई तक इसकी खेती की जा सकती है।

* इसमें कोई गंधक नहीं होता, कोई सुगंध नहीं होती और 10 प्रतिशत अंतरनिर्मित आक्सीजन होती है जो इसको पूरी तरह से जलाने में सहायक होती है।

* जटरोफा मान रतनजोत की महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा वाहनों के इंजन में किसी प्रकार के परिवर्तन के बिना इस जैव ईंधन का इस्तेमाल करना संभव है।

* इसका तेल पूरी तरह से प्रदूषण रहित होता है तथा सल्फर की मात्रा शून्य होती है। इसे पर्यावरण के यूरो-3 मानकों में रखा गया है।

* यह जैव ईंधन कतई ज्वलनशील नहीं होता है जिसके कारण इसका परिवहन व भण्डारण भी आसान है।

* वनस्पति वैज्ञानिकों के अनुसार तीन मीटर ऊँचे झाड़ीनुमा रतनजोत का फिलहाल कोई खास उपयोग नहीं है।

* यह कई इलाकों में स्वतः ही उग जाता है।

* डीजल उपयोग के अलावा साबुन और काॅस्मेटिक निर्माण में भी इसका उपयोग होता है।

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