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झीलों का महत्व समझें और उनको बचानें में योगदान दें

झीलों  का महत्व समझें । उनमें और आर्द्रभूमि में बहते जल स्रोतों के स्तर को बनाए रखकर बाढ़ और सूखे को नियंत्रित  करने की क्षमता होती है और ये भूजल को रीचार्ज करने में सहायक है। इनके अन्दर गाद भी जमा होता रहता है जिनसे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को ताजे पोषक तत्त्व मिलते रहते हैं। झीलें और आर्द्रभूमि कार्बन को पृथक करने का कार्य करती हैं। जिनसे विश्व का जलवायु विनियमित होता है और आर्द्रभूमि ग्रीन हाउस गैस उर्त्सजन के उद्गम और समापन दोनों का स्रोत है।

जल क्षेत्र का घटते चला जाना

बहती नदियों के तटबंधों से बहुत सारे पदार्थ जल स्रोतों में जाकर मिल जाते हैं : गाद, पोषक तत्व, वनस्पति और जीवजंतु के अंश, बीज, बीजाणु और अंडे। विगत के कुछेक दशकों में भूमि उपयोग में तेजी से हुए परिवर्तन और शहरी तथा औद्योगिक विकास और गहन कृषि के कारण ताजे जल पारिस्थितिकी के क्षेत्रफल और गुणवत्ता में काफी कमी आई है। झीलों का महत्व न समझकर उनका अतिक्रमण हुआ है और उसका क्षेत्रफल घटा है तथा जलधारण की उसकी क्षमता कम हुई है। ऐसे अतिक्रमणों, ठोस अवशिष्टों के निस्तारण और घरेलू तथा औद्योगिक अवशिष्टों को उनमें बहाने के कारण झीलों का भारी विनाश हुआ है। अधिकतर छोटे-छोटे झील नाली बना दिए जाने तथा कुड़ा-करकट डाले जाने के कारण समाप्त हो चुके हैं। शेष बची झीलों में भी तेजी से गाद भर रहे हैं या फिर उनमें काफी पोषक तत्त्व जमा हो चुके हैं। इन परिवर्तनों ने मत्स्य प्रजातियों के चलते रहने के पैटर्न और नदियों में अधिवास की संरचना प्रभावित हुई है; तटवर्ती पारिस्थितिकी में बदलाव आया है और ताजे जल की जैवविविधता का समग्र नुकसान हुआ है। सिंचाई से शुष्क भूमि में खाद्य उत्पादन बढ़ा है लेकिन अधिकतर मामलों में व्यापक सार्वजनिक निवेश के अभाव में यह संपोषित नहीं हो पाता है क्योंकि जल जमाव और जल में खारापन आने से प्रणाली नष्ट होती है तथा मानव रोगों के वाहक विकसित होते या फैलते हैं। राजस्थान में इंदिरागांधी नहर के बांध क्षेत्र में फैली मलेरिया महामारी इसका एक उदाहरण है। झीलों और आर्द्रभूमि के मामले में दूसरी बड़ी समस्या उसके जल का व्यापक तौर पर मुख्य रूप से कृषि के लिए उपयोग कर लिया जाता है। हम जानते हैं कि केवलादेव राष्ट्रीय पार्क (भरतपुर) जो कि एक प्रख्यात आर्द्रभूमि तथा विश्व विरासत स्थल है, का अब काफी विनाश हो चुका है क्योंकि उसके जल का कृषि कार्यों के लिए भारी उपयोग में लाया जा रहा है। क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति विश्व के सभी भागों में चिंता का विषय बना हुआ है। पोषक तत्त्वों की अधिकता की समस्या ने 1950 के दशकों में ही यूरोप और उत्तरी अमरीका में झीलों को काफी प्रभावित किया था। यह पाया गया है कि 1980 की दशक में संयुक्त राष्ट्र के आर्द्रभूमि का 50 प्रतिशत से भी अधिक नाली में विलीन हो गया था। कैस्पियन सागर और अराल सागर के बेसिनों से जल का अन्यत्र बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ है। आईपीसीसी की अद्यतन रिपोर्ट एक दूसरी समस्या को प्रमाणित करती है कि विश्व की जलवायु बदलने लगी है जिसने हम सभी को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है कि ग्लेशियरों और बर्फ की चोटी के पिघलने से अवक्षेपण की परिवर्तनीयता में वृद्धि होती है और इसके कारण अतिरेक से भरी घटना (बाढ़ और सूखा) बार-बार होती हैं और उनकी तीव्रता बढ़ती चली जाती है। ताजे जल की पारिस्थितिकी पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ा है और इसके परिणामस्वरूप जल की गुणवत्ता घटी है तथा जैवविविधता में परिवर्तन हुआ है।

ऐतिहासिक महत्व

भारत में बड़ी संख्या में अलग-अलग प्रकार के झीले हैं। हमारे बहुत से झीलों का महत्व  अपनी अनुपम पारिस्थितिकी प्रणाली के कारण है और वे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, जैविक और कार्यात्मक दृष्टि से काफी बहुमूल्य हैं। हिमालय क्षेत्र में अपेक्षाकृत छोटे-छोटे झील हैं लेकिन वे काफी पवित्र झील हैं, जहां बहुत सारे साधु महात्माओं ने ध्यान लगाया था। पवित्र पुष्कर जैसे झील जो कि इस ब्रह्माण्ड के निर्माता ब्रह्मा को समर्पित है जहां प्रति वर्ष सर्दी की शुरूआत में विश्व के प्रत्येक भाग से लाखों श्रद्धालु और सैलानी पवित्र स्नान करने के लिए आते हैं। भारत में न सिर्फ प्राकृतिक झीलों का महत्व रहा है बल्कि वर्षा जल के संचयन के लिए झीलों का निर्माण करने की भी प्राचीन परम्परा है। झील का निर्माण किया जाना एक अच्छे राजा का कर्तव्य तथा समुदाय का पवित्र कृत्य माना जाता था। 1000 वर्ष से भी पहले राजा भोज ने भोपाल में एक बड़ी झील का निर्माण कराया था जिसे अब भोज आर्द्रभूमि के नाम से जाना जाता है। पिचोला, जयसमन्द, फतेहसागर और उम्मेदसागर जैसे बड़े झीलों के निर्माण करने के मामले में राजस्थान आगे रहा है। जयपुर में 400 वर्ष पहले मानसागर झील का निर्माण किया गया था जबकि शहर की नींव भी नहीं पड़ी थी। 125 से भी ज्यादा वर्ष पूर्व जाम्बा रामगढ़ झील का निर्माण किया गया था जिसका उद्देश्य नगर को पानी प्राप्त कराना था। मानव निर्मित झीलें सबसे अधिक आंध्र प्रदेश और कर्नाटक राज्यों में है। आज, भारत में मानव निर्मित झीलों और छोटे-छोटे जलकरों की संख्या लगभग 1.3 मिलियन है।

इसके क्षेत्रफल में हो रही कमी की समस्या से निपटना

भारत समस्या के प्रति पहले से ही पूरा सचेष्ट है। वर्ष 1974 में ही जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 हमारे जल स्रोतों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पारित किया गया था। गंगा कार्य योजना और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के अन्तर्गत अवशिष्ट जल को संसोधित करके घरेलू और औद्योगिक उपयोग में लाए जाने वाले जलस्रोतों के प्रदूषण को कम करने पर ध्यान दिया गया है। एनआरसीपी के अन्तर्गत आज 34 नदियों को शामिल किया गया है। कई आर्द्रभूमि क्षेत्रों और उनकी जैवविविधता भारतीय वन्यजीव अधिनियम के अधीन संरक्षित है। भारत ने सभी पर्यावरणीय अभिसमय पर हस्ताक्षर किए हैं जैसे कि आर्द्रभूमि पर रामसर अभिसमय, सीबीडी, प्रवासी प्रजातियों पर बॉन अभिसमय और दुर्लभ प्रजातियों पर साइट्स आदि और उन अभिसमयों को भारत में लागू करने हेतु कदम उठाए हैं। भारत ने 25 प्रमुख आर्द्रभूमि को सभी जलवायु क्षेत्रों से अलग रखने की घोषणा की है जैसे कि रामसर स्थल और अन्य बहुत सारी आर्द्रभूमि के बारे में सक्रिय रूप से विचार चल रहा है।

वर्ष 2001 में, पर्यावरण और वन मंत्रालय राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम भी शुरू किया जिसमें 13 राज्यों में 48 झीलों का महत्व समझकर उनके  पुनरूद्धार और उनके प्रबंधन के लिए परियोजनाएं मंजूर की गई हैं। योजना आयोग ने एनएलसीपी के लिए बड़ी हुई धनराशि आवंटित की है। शुरू में वर्ष 2001 में 25 करोड़ रूपये दिए गए और गत योजनावधि में 220 करोड़ रूपये का बजटीय आवंटन किया गया। श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर)  के डल झील जो तैरते बगीचों और शिकारों के लिए प्रसिद्ध है, के पुनरूद्धार के लिए पर्याप्त धनराशि दी गई है। कार्यक्रम के अन्तर्गत नैनीताल झील और कुमाऊं स्थित अन्य झीलों तथा जयपुर स्थित मानसागर के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। तथापि, संरक्षण और नवीकरण के माध्यम से एक समेकित और समग्र जल संसाधन प्रबंधन अति आवश्यक है।

आज ‘युग्म झीलों’ की संभावना तलाशी जा सकती है जिसके अन्तर्गत किसी विकसित देश में स्थित झील और विकासशील देश में स्थित झील के बीच भागीदारी कायम की जा सकती है। इस भागीदारी में शामिल विकसित देश को अपने अनुभव बांटते हुए विकासशील स्थित झील के संरक्षण के लिए वित्तपोषण एवं प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने का समझौता करना चाहिए।

उपलब्धियां

कई झीलों के पुनरूद्धार करने के मामले में भारत के प्रयासों को विश्व स्तर पर मान्यता दी गई है। प्राकृतिक ताकतों के कारण चिलका झील प्रभावित हो गई और उसका बंगाल की खाड़ी से जुड़ाव समाप्त हो गया जिसके कारण उसमें पानी की आवाजाही कम हो गयी और उसके खारेपन के स्तर पर बदलाव आ गया। चिलका झील के जल का पुनरूद्धार का कार्य तत्काल शुरू कर दिया गया जिसके लिए भारत को रामसर संरक्षण पुरस्कार मिला। उसी प्रकार, स्थानीय समुदायों को सक्रिय रूप से शामिल करके झील बेसिन का ध्यान रखते हुए भोपाल स्थित झील का पुनरूद्धार किया गया जिसकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा की गई।

जल सुरक्षा

झीलों और आर्द्रभूमि के संरक्षण से जल सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। मांगों और उपयोगों के बीच संघर्षों का समाधान करने हेतु बहु-शाखीय कार्यवाही और सभी शेयर धारकों की सहभागिता की जरूरत है। पर्यावरण के विभिन्न संघटकों और जल के अत्यधिक महत्व के बीच व्याप्त मुद्दों और सम्पर्कों की समझ बढ़ाने के लिए हमें जनशिक्षा और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। हमारे विकास और समृद्धि के लिए ही जल का महत्व नहीं है बल्कि हमारे अस्तित्व के लिए भी वह जरूरी है। झीलों का महत्व समझते हुए उनको और आर्द्रभूमि का संरक्षण और विविध और विभिन्न प्रयोक्ताओं की जरूरतों को समेकित करने पर हमारा सबसे अधिक ध्यान होना चाहिए तथा इस कार्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। झीलों को बचाने का अभियान ऐसा क्षेत्र है जिस पर विश्वव्यापी तौर पर कार्य करने की जरूरत है। जल सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए गंभीर कदम उठाने पर विचार करने का समय आ चुका है। प्रौद्योगिकीयों और क्षमता निर्माण का आदान-प्रदान ऐसे सहयोग का प्रमुख आधार बनना चाहिए।

लोगों की सहभागिता झीलों को टिकाऊ रूप में संरक्षित रखने की सफलता की कुंजी है। इसमें व्यावहारिक पैटर्न की जरूरत है जिसमें लोग वैयक्ति या सामूहिक तौर पर सचेष्ट होकर जल स्रोतों को गंदा नहीं करें। स्थानीय निकायों को उसमें शामिल करने से उनमें स्वामित्व का भाव और झीलों के परिचालन, रखरखाव और प्रबंधन का कार्य करने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। गैरसरकारी संगठन न सिर्फ झीलों को संरक्षित करने की जरूरत के बारे में जागरूकता पैदा करने में योगदान दे सकते हैं बल्कि क्षमता निर्माण के मामले में भी स्थानीय समुदायों को मदद कर सकते हैं। स्पष्ट है, कि हमें ‘झील बचाओं आन्दोलन’ को सफल बनाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने की जरूरत है।

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