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रोकें गुर्दे में पत्थर का बनना

गुर्दे में पत्थर होना बड़ा ही तकलीफदेह होता है, पर मूत्राशय संबंधी रोगों में सबसे आम रोग यही है। गुर्दे में मौजूद पत्थर सामान्यतः बिना किसी चिकित्सीय हस्तक्षेप के बाहर निकल जाते हैं। आमतौर पर मूत्र में ऐसे रसायन मौजूद होते हैं जो पत्थर बनने की प्रक्रिया को रोकते हैं अथवा उसमें रूकावट बनते हैं। ये रसायन कभी.कभी कारगर नहीं हो पाते हैं, इस प्रकार कुछ लोगों में पत्थर बन जाता है। जबकि पित्ताशय में बनने वाले पत्थर और गुर्दे में बनने वाले पत्थर आपस में संबंधित नहीं होते हैं। वे शरीर के अलग.अलग भागों में बनते हैं। जिस व्यक्ति के पित्ताशय में पत्थर बने होंए जरूरी नहीं कि उसके गुर्दे में भी पत्थर बने।

किसके गुर्दे में पत्थर बनते हैं :

पत्थर अधिकतर पुरूषों में बनते हैं। जब पुरूष 40 वर्ष की अवस्था में प्रवेश करता है तो गुर्दे में पत्थर बनने की घटनाओं में नाटकीय रूप से वृद्धि होती है और यह स्थिति उनके 70 वर्ष की अवस्था में पहुंचने तक जारी रहती है। महिलाओं में, 50 वर्ष की अवस्था में पत्थर बनने की सबसे अधिक घटना होती है। एक बार यदि किसी व्यक्ति में एक से अधिक पत्थर बन जाए तो और अधिक पत्थर बनने की संभावना हो सकती है।

किन कारणों से गुर्दे में पत्थर बनते हैं :

चिकित्सक हमेशा ही यह जानने की स्थिति में नहीं होते कि किस कारण से गुर्दे में पत्थर बनता है। जिन लोगों में पत्थर बनने की संभावना होती हैए उनमें कतिपय किस्म के भोजन से पत्थर का बनना बढ़ सकता है।  लेकिन वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते कि जिन व्यक्तियों में ऐसा होने की संभावना नहीं होतीए उनमें कोई विशिष्ट प्रकार के भोजन करने से पत्थर बन सकता है। गुर्दे में पत्थर बनने की शिकायत जिन लोगों के पारिवारिक इतिहास में होती हैए उनमें पत्थर बनने की अधिक संभावना होती है। मूत्रवाहिनी नलिका में संक्रमणए गुर्दे की बीमारी जैसे कि मूत्राशय में रोग और हाइपरआथीइरोडिज्म जैसी उपापचय संबंधी गड़बड़ियां भी पत्थर बनने से जुड़ी होती हैं।

गुर्दे में पत्थर होने के क्या लक्षण हैं :

गुर्दे में पत्थर बनने के अक्सर ही कोई लक्षण नहीं दिखते। आमतौर परए गुर्दे में पत्थर होने का पहला लक्षण तेज दर्द का ही होना है। जब पत्थर मूत्रवाहिनी नलिका में पहुंच कर मूत्र के प्रवाह हो बाधित कर देता हैए तो अचानक दर्द शुरू हो जाता है। विशेष तौर परए व्यक्ति पीठ और गुर्दे के पास के क्षेत्र या पेडू के निचले भाग में तेज और ऐंठन भरा दर्द महसूस कर सकता है। कभी-कभी व्यक्ति का जी मिचला सकता है और उल्टी हो सकती है। बाद मेंए दर्द ग्रोइन तक पहुंच सकता है। यदि इन लक्षणों के साथ बुखार और ठंड की भी शिकायत हो, तो संक्रमण हो सकता है। इस स्थिति में  व्यक्ति को तुरन्त चिकित्सक को दिखलाना चाहिए।

इसकी रोकथाम कैसे करें :

पत्थर बनने से रोकने के लिए जीवनशैली में सरल और सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि अधिक मात्रा में तरल पदार्थ पिये जाएं, पानी सर्वोत्तम है। जिन व्यक्तियों में पत्थर की प्रवृत्ति हो, उन्हें पूरे दिन में अधिक से अधिक मात्रा में तरल पदार्थ लेने चाहिए ताकि 24 घंटे में कम से कम 6 बार व्यक्ति मूत्र त्याग के लिए जाए।

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