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समुद्री खरपतवार तटवर्ती क्षेत्रों में आजीविका की आशा

समुद्र और खारे पानी में वृहत् रूप में उगने वाले समुद्री शैवाल को आज खाद्य, चारा, खाद, औषधि और रसायनों के सर्वोत्तम स्रोतों में से एक माना जाता है। समुद्री खरपतवार के अर्क का टूथपेस्ट, आइसक्रीम, टोमेटो कैचप, टेक्सटाइल प्रिंटिंग, दांत भरने, सौंदर्य प्रसाधनों, ऊतक संवर्धन प्लाईवुड, पैकेजिंग और अन्य बहुत सारे उद्योगों में विस्तृत उपयोग होता है। हाल ही में यह प्रस्ताव किया गया है कि खरपतवार की बड़े पैमाने पर खेती का उपयोग कार्बन डाई-आक्साइड  स्व-विनियोजन के लिए उपयोग किया जा सकता है जिससे वैश्विक तापवृद्धि से निपटा जा सकता है।

चीन, जापान, कोरिया और फिलिपीन्स एक साथ वार्षिक तौर पर सैकड़ों मिलियन डालर मूल्य के लगभग 24 मिलियन टन आद्र खरपतवार का उत्पादन करते हैं। समुद्री खरपतवार उद्योग पूरे विश्व में कई मिलियन डालर का तेजी से बढ़ता उद्योग है और भारत में इसके विशाल तटवर्ती क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों की आजीविका के लिए एक वैकल्पिक साधन के रूप में विकसित करने का भारी अवसर है।

अब तक 7000 कि.मी. लम्बी भारतीय तटरेखा और अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी स्थित द्वीपसमूहों में निवास करने वाले अधिकतर लोग अपनी आजीविका के लिए मत्स्यन और संबंधित गतिविधियों पर निर्भर करते हैं। उन लोगों की दैनिक कमाई थोड़ी है और अपनी जरूरतों को संपूरित करने हेतु बहुत सारे लोग प्रवाल खनन या अंधाधुंध समुद्री खरपतवार की कटाई जैसी गतिविधियों में लग जाते हैं, जो कि समुद्री पारिस्थितिकी प्रणाली के लिए हानिकारक है। बीमारी, कुपोषण, रोजगार के अवसरों में कमी और अन्य कई समस्याओं के कारण बहुत सारे लोग नजदीक के शहरों में चले जाते हैं अतः लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने हेतु उनकी कमाई की क्षमता में बढ़ाने की तत्काल जरूरत है। समुद्री खरपतवार की खेती और उपयोग विकल्पों में से एक है, जो विशेषकर महिलाओं के लिए कमाई के अवसर पैदा कर सकता है जो दिन में पुरूषों के मछली पकड़ने के लिए चले जाने के बाद खाली बैठी रहती हैं।

वर्तमान में भारतीय उद्योग में समुद्री खरपतवार की मांग बढ़ रही है लेकिन आपूर्ति का स्तर कम है। भारत के पास एक सुनियोजित खरपतवार कृषि कार्यक्रम मौजूद नहीं है और जंगली स्रोतों से इसका दोहन होने से समुद्री पारिस्थितिकी प्रणाली को काफी नुकसान पहुंचा है।

अपनी अद्वितीय संकल्पना, कार्यनीति कार्यान्वयन, कई संस्थानों, विश्वविद्यालयों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ प्रशिक्षण मोड्युल और समन्वय में समानता आधारित एक कार्यक्रम शुरू किया गया है। कार्यक्रम में आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री खरपतवारों की चार प्रजातियों – सरगासम स्पेशल, पारफाइरा स्पेशल, ग्रेसिलेरिया वेरूकोसा और कपाफाइकस अल्वारेज की भारतीय तटवर्ती क्षेत्र के विभिन्न भागों में बड़े पैमाने पर खेती करने हेतु पहचान की गई है। घरेलू और अन्तर्राष्ट्रीय दोनों ही बाजारों में उनकी मांग पर विचार करते हुए इन चार प्रजातियों का चयन किया गया है।

समुद्री खरपतवार  ग्रेसीलेरिया की खेती पर ध्यान केन्द्रित करना

पूरे विश्व भर में ग्रेसीलेरिया की 10 प्रजातियां फैली हुई हैं। ग्रेसीलेरिया वेरूकोसा को इसलिए चुना गया है क्योंकि यह व्यापक रूप से फैला हुआ है, आसानी से अनुकूल स्थिति को प्राप्त कर लेता है और एगार का एक अच्छा स्रोत है जिसके कई उपयोग हैं। एगार की जल सान्द्रता, गाढ़ापन और पैदावार एगार उद्योग के तीन महत्वपूर्ण कारक हैं। अतः सही प्रजातियों का चयन और ग्रेसीलेरिया का समुचित वंश बहुत महत्वपूर्ण है। ग्रेसीलेरिया वेरूकोसा 5-34 वी.पी.टी. से खारेपन की विस्तृत श्रेणी में उगता है। यह खारे जल और समुद्र के मैनग्रोस दलदल में बढ़ता है। ग्रेसीलेरिया की दो विशिष्ट संरचनाएं हैं .-1 जड़ से जुड़ी प्रकार तथा 2-तैरने वाली प्रकार , जैसा कि चिलका झील, उड़ीसा में पाया जाता है।

बड़े पैमाने पर खेती शुरू करने से पूर्व, पौधे की दैनिक वृद्धि दर निर्धारित करना और पौध बैंक भी सृजित करना महत्वपूर्ण है। सलाह यह है कि दो या तीन स्थानों पर लगभग आधे एकड़ के छोटे क्षेत्र में परीक्षण के लिए पौध लगाए जाने को प्राथमिकता देनी चाहिए। सर्वोत्तम स्थल का भावी पौध बैंक के तौर पर भी उपयोग किया जा सकता है।

कृषि स्थल की तेज हवा से रक्षा की जानी चाहिए और मीठे पानी के स्रोतों से दूर रहना चाहिए। प्रदूषित पानी से बचना चाहिए। तापमान, प्रकाश और पीएच (7.5-80) जैसी विभिन्न पारिस्थितिकीय दशाओं की अनुकूलता के लिए जांच की जानी चाहिए। वह स्थान समुद्र या खारे पानी के पास अवस्थित होना चाहिए।

ग्रेसीलेरिया की खेती के लिए किसी परिष्कृत मशीनरी या बड़े निवेश की जरूरत नहीं होती। बांस, नाइलॉन की रस्सियों, मछली पकड़ने के फेट जालों, हथोड़े आदि जैसी साधारण वस्तुओं की जरूरत पड़ती है। ग्रेसीलेरिया की खेती तीन प्रकार से की जा सकती है – खुले जल में खेती, तालाब में खेती और पोखर में खेती। इसकी खेती के लिए किसी खाद या रासायनिक उपचार की जरूरत नहीं होती। एक बार इसकी खेती शुरू होने पर ग्रेसीलेरिया प्राकृतिक तौर पर बढ़ता है।

खेत में समुद्री खरपतवार की कटाई हाथों से या स्थानीय रूप से उपलब्ध हाथ से बने सरल औजारों से की जा सकती है। कटाई के बाद, पौधों की खेतों में सफाई करने तथा ऊंचे मचानों पर 2-3 दिनों तक धूप में सुखाने की जरूरत पड़ती है। पौधों की सफाई समुद्री जल/खारे जल में ही कर देनी चाहिए जहां उनकी खेती की जाती है। समुद्री खरपतवारों की सफाई मीठे जल में नहीं की जानी चाहिए क्योंकि एगार की गुणवत्ता को क्षति पहुंचती है। उन्हें रेत पर रखकर नहीं सुखाना चाहिए। समुद्री खरपतवारों के पूरी तरह से सूख जाने पर उन्हें प्लास्टिक या जूट के बोरे में पैक करना चाहिए। आधे सूखे खरपतवारों को भंडारित नहीं करना चाहिए क्योंकि उनमें फंगस लगने या जीवाणु से संक्रमित होने का खतरा बना रहता है। बोरे को नमी से दूर सूखे स्थान पर भंडारित करना चाहिए।

समुद्री खरपतवारों का विपणन

समुद्री खरपतवार उगाने वाले किसान अपनी फसल पूर्व निर्धारित मूल्य पर बेचने के लिए सम्बन्धित उद्योगों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। वैकल्पिक तौर पर, किसान अपनी ग्रामीण सहकारी समिति का गठन करके इनके माध्यम से खरपतवार बेच सकते हैं। एक व्यक्ति एक एकड़ जल क्षेत्र में खरपतवार की खेती से प्रत्येक महीने 7,000-10,000 रूपये कमा सकता है।

खरपतवारों का प्रसंस्करण

खरपतवारों का प्रसंस्करण संबंधित उद्योगों द्वारा किया जाना चाहिए क्योंकि इसमें पूंजीगहनता होती है। एक ही प्रजाति से कई उत्पाद प्राप्त किए जा सकते हैं, यह जरूरतों और अन्तिम उपयोग पर निर्भर करता है।

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