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मंगल ग्रह तक भारत की सफल यात्रा गाथा

किसी अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की कक्षा से बाहर अंतरिक्ष के निर्वात में ले जाना और फिर किसी अन्य ग्रह की कक्षा में स्थापित करना एक बड़ी कठिन चुनौती है। पृथ्वी का गुरुत्व बल अपने वायुमंडल की सभी वस्तुओं को अपनी ओर खींचता है, और अंतरिक्ष यान को भी। पृथ्वी का सघन वायुमंडल इसके अंदर होकर गुजरने वाले राकेट की गति को बाधित करता है। एक राकेट का सफर कई बाधाओं को पार करने के बाद पूरा होता है। मंगल ग्रह तक भारत का सफर पूरा होने में भी कई बाधाएं सामने आयीं।

राकेट ऐसे सक्षम यान होते हैं जो पृथ्वी के प्रबल गुरुत्वबल के विपरीत दिशा में यात्रा कर अंतरिक्ष के निर्वात में पहुंच सकें। इनका उपयोग उपग्रहों, समानव एवं मानव रहित अंतरिक्ष यानों को पृथ्वी की कक्षा में अथवा कक्षा से बाहर ले जाने में किया जाता है। मंगल कक्षित्र यान को पृथ्वी से ऊपर ले जाकर एक योजित कक्षा में स्थापित करने वाला राकेट ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचक ‘पी.एस.एल.वी.-सी25’ है। 5 नवम्बर 2013 को दोपहर 2 बजकर 38 मिनट पर इस राकेट का सफर प्रारम्भ होने के साथ ही मंगल ग्रह तक भारत के पहुँचने का सफर शुरू हो गया।

अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम

पृथ्वी का सघन वायुमंडल पार करने के बाद पी.एस.एल.वी.-सी25 के शीर्ष पर स्थित तापकवच जिसमें मंगल कक्षित्र यान सुरक्षित था, राकेट से अलग हो गया, अगले 24 मिनट तक राकेट की यात्रा बिना किसी ऊर्जा के जारी रही। इसके बाद राकेट के दो इंजन प्रज्ज्वलित हुए और उड़ान शुरू होने के 44 मिनट बाद राकेट ने मंगल यान को पृथ्वी की पार्किंग कक्षा में घूमने के लिए आवश्यक गति प्रदान कर दी। इसके बाद राकेट मंगल यान से अलग हो गया। राकेट द्वारा प्रदान की गयी गति लगभग 35 हजार किलोमीटर प्रति घंटा थी। मंगल ग्रह तक भारत के सफर का एक अहम् चरण पूरा हो गया।

मंगल यान यात्रा का अलग चरण ‘कक्षा संवर्धन’ था। पी.एस.एल.वी.-सी25 ने मंगल यान को पृथ्वी की कक्षा में पहुँचा दिया था और अब इसे मंगल की कक्षा में पहुँचना था तथा मंगल की परिक्रमा करनी थी। यह काम एल.ए.एम. (द्रव अपभू मोटर) ने किया जो मंगल यान का मुख्य राकेट इंजन था। आठ प्रकोष्ठों द्वारा समर्थित एल.ए.एम. ही मंगल ग्रह की कक्षा में मंगल यान के सफल प्रवेश के लिए जिम्मेदार है। मंगल तक भारत के पहुँचने में इसका काम अहम है।

‘कक्षा संवर्धन’ नामक दूसरे चरण में, एल.ए.एम. को छः बार प्रज्ज्वलित किया गया। 7 से 16 नवम्बर, 2013 के मध्य जब मंगल यान पृथ्वी से निकटतम दूरी 248 किलोमीटर पर था, इसी समय यह कार्य हुआ। बार-बार प्रज्ज्वलन से कक्षा का दूरस्थ बिन्दु ऊपर की ओर अग्रसर होता गया और अंततः यह लगभग 1,93,000 किलोमीटर ऊपर पहुँच गया।

मंगल ग्रह तक भारत के सफर का अगला प्रमुख चरण 1 दिसम्बर, 2013 को शुरू हुआ। इसरो द्वारा भेजे गये रेडियो संदेशों को ग्रहण करने के बाद एल.ए.एम. उचित समय पर जीवंत हुआ, अपेक्षित अवधि के लिए प्रज्ज्वलित हुआ और सही समय पर बंद हो गया। इस क्रिया अवधि में मंगल यान ने पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त कर ली और आगे बढ़ चला। पृथ्वी से 10 लाख किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यह पृथ्वी के प्रभाव मंडल से दूर हो गया। मंगल ग्रह तक भारत का सफर पूरा करने में इसने अगले 300 दिनों में लगभग 67 करोड़ किलोमीटर की यात्रा पूरी की। 9 अप्रैल, 2014 तक मंगल यान ने अपनी यात्रा का आधा सफर तय कर लिया था।

24 सितम्बर, 2014 के प्रातः काल में इसरो के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह तक भारत का यात्रा को सफल करने के लिए अंतिम रूप से निर्णायक कदम उठाने शुरू कर दिये। मंगल यान की दिशा धीरे-धीरे परिवर्तित कर एल.ए.एम. को उचित दिशा के अभिमुख किया गया। जिससे एल.ए.एम. मंगल यान की गति को धीमा कर सके। इसी दिन, भारतीय मानक समय के अनुसार सुबह 7 बजकर 17 मिनट पर मंगल कक्षित्र यान मंगल ग्रह के निकट से गुजरा। तभी, उसके मुख्य राकेट इंजन और आठ प्रणोदकों को एक साथ प्रज्ज्वलित किया गया। 24 मिनट की अवधि तक चले इस प्रज्ज्वलन से मंगल यान की गति अत्यन्त धीमी हो गई। अब मंगल यान लाल ग्रह की एक दीर्घ अंडाकार कक्षा में प्रवेश पा गया और मंगल ग्रह के गुरुत्वाकर्षण घेरे में आ गया। मंगल ग्रह तक भारत का शानदार सफर सफलता से पूरा हुआ।

मंगल कक्षित्र मिशन के सभी प्रमुख क्रियाकलापों का केन्द्र बेंगलुरु के उत्तरी क्षेत्र में स्थित पीण्या का अति उच्च तकनीकी अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र है। यहाँ के वैज्ञानिक मंगल यान का नियंत्रण तथा दिशा-निर्देश करते हैं, इसके स्वास्थ्य एवं उड्डयन प्रगति का मॉनीटरन करते हैं एवं अंतरिक्ष में इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। मंगल ग्रह तक भारत की सफल यात्रा में इनका योगदान अनुपम है।

मंगल ग्रह के भू-वैज्ञानिक तथ्य

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