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जलवायु परिवर्तन के मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

संसार के बहुत से भागों मेंए विशेषकर तापमान में हो रही निरंतर वृद्धि ने शारीरिक और जैविकीय व्यवस्थाओं के विभिन्न ढंगों को तरह.तरह से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। मनुष्य के कार्यों का नकारात्मक प्रभाव आने वाली पीढ़ी पर निश्चित रूप से पड़ेगा।

वायुमण्डल में ग्रीन हाउस गैसोंए विशेषकरए कार्बन डाईआक्साइड और मीथेन के जमाव में बढ़ोतरी होती जा रही है। 1850 के दशक सेए जब से तापमान का रिकॉर्ड (दर्ज) करना प्रारंभ हुआए विश्व का तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस प्रतिवर्ष के लगभग बढ़ा है या गर्माया है और अधिकांश गर्माहट तो पिछले तीन दशकों में ही नज़र आई है।

ऐसा अनुमान लगाया गया है कि वातावरण में यह कार्बन डाईआक्साइड पिछले सौ वर्ष से भी ज्य़ादा समय से विद्यमान है और हमारे द्वारा जो कार्य आज किए जा रहे हैंए उनका नकारात्मक प्रभाव मानव स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियों की आशाओं पर निश्चित रूप से पड़ेगा।

तापीय दबाव : जलवायु परिवर्तन के कारण गर्म हवाओं के समय अंतराल में होती जा रही निरंतर बढ़ोतरी एक ख़तरनाक प्रवृत्ति की ओर संकेत है।

शहरी गर्म द्वीप प्रभाव का परिणाम यह होता है कि उपशहरी या ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों में तापमान अधिक बना रहता है। इसका मुख्य कारण गर्मी को काफी मात्रा में अपने में सोखने वाले धरातल-कुछ कठोर और काले असफाल्ट हैं।

प्रायः यह देखा गया है कि गर्म जलवायु वाले शहरों के मानव स्वास्थ्य की अपेक्षा जिन शहरों की जलवायु ठण्डी है वहां जलवायु परिवर्तन ताप के प्रभाव से होने वाली मृत्यु की दर अधिक होती है। इसका मुख्य कारण यह है कि गर्म जलवायु में रहने वाली जनसंख्याए काफी हद तक तापमान के उतार.चढ़ाव को सहन कर लेती है। विश्व में जगह.जगह जिस दर से ठण्ड से मरने वालों की संख्या में कमी होगीए उसी दर से गर्मी से मरने वालों की संख्या में भी वृद्धि होती चली जाएगी।

बाढ़ और सूखा : विकासशील देशों में रहने वाली जनसंख्या के बाढ़ का शिकार होने की संभावना बहुत ही अधिक है। इसके कई कारण है . अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में उनका रहना जैसे बाढ़ के मैदान और तटीय क्षेत्रए कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य आधारभूत ढांचा और जनसंख्या की आनुपातिक रूप से आर्थिक हानि। विशेषकर विकासशील देशों में स्वास्थ्य प्रभावों में शारीरिक चोट और अतिसार रोगों का बढ़ना भी शामिल है। इन देशों में कुपोषण के बढ़ने की संभावना भी अधिक ही है। जनसंख्या के बोझ के कारण श्वास संबंधी रोगों के मामले बढ़ रहे हैं। मिट्टी के रेत के अधिक पैदा होने से (बनने से) श्वास संबंधी लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। इन देशों में मनोवैज्ञानिक असंतुलन जैसे बेचैनी और अवसाद के मामले बढ़ रहे हैं। जिसके कारण घर का वातावरण नष्ट हो रहा है और आर्थिक रूप से जनता को हानि भी पहुंच रही है। आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है और बच्चों में व्यवहार असंतुलन के मामलों में भी वृद्धि हो सकती है। यह एक भयावह स्थिति है और जिसका समय रहते निदान आवश्यक है। विकासशील देशों में सूखे का असर मानव स्वास्थ्य पर भी देखा जा सकता है। सूखे के कारण खाद्य उत्पादनए जीवन रक्षा पद्धति और मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

वायु प्रदूषण : यद्यपि ग्रीष्म काल में या उच्च तापमान वाले दिनों में वायु प्रदूषण का प्रभाव अधिक होता हैए परन्तु यह कोई सर्वव्यापक अन्वेषण नहीं है। फिर भी ओजोन का स्तर उच्चतर तापमान पर अधिक होता है और कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि अत्यधिक मृत्यु दर के लिए यह ओजोन उत्तरदायी हो चली है। जलवायु परिवर्तन से वनों में आग लगने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई है।

संक्रामक रोग : तापमानए आर्द्रताए वर्षा और समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी के कारण संक्रामक रोगों के मामलों पर प्रभाव पड़ सकता है। मच्छरए जूं और मक्खियां सूक्ष्म तापमान और आर्द्रता में परिवर्तन के प्रति बहुत ही संवेदनशील होते हैं।  परन्तु रोग वाहक जनित रोग भी बहुत सारे अन्य परस्पर आधारित कारकों पर निर्भर करते हैं। यद्यपि हाल के वर्षों में संक्रामक रोगों का प्रादुर्भाव हुआ हैए परन्तु अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि इनके लिए जलवायु परिवर्तन ने कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अन्य कारकों.मानव व पशु जनसंख्या की गतिशीलताए सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे का चरमरानाए भूमि प्रयोग में बदलाव को सहायक कारकों में गिना जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभाव व परिवर्तन रोगवाहक और कृतंक पशुओं से पैदा होने वाले रोगों से स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। मलेरिया और डेंगू के मामलों में वृद्धि हो रही है। यहां इस बात का उल्लेख करना अत्यन्त आवश्यक है कि विश्व के अधिकांश भागों में प्रभावकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं से मलेरिया रोग फैल नहीं पाता है और यह रोग अपने वितरण की जलवायु सीमा में ही बना रहता है।

नवीनतम जलवायु परिदृश्य का प्रयोग करते हुए संबंधी प्रयोगए यह सुझाव देते हैं कि सन् 2100 तक अफ्रीका में मलेरिया वितरण में 5 से 7 प्रतिशत की संभावित वृद्धि होगी। यह सुझाव भी दिया गया है कि मुख्य तौर पर मलेरिया रोग अक्षांशतर की अपेक्षा देशांतर क्षेत्र में अधिक फैलेगा।

जिन क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य का आधारभूत ढांचा चरमरा गया है ;जैसे मध्य एशिया और पूर्व सोवियत संघ के दक्षिण भागद्ध वहां जलवायु परिवर्तन के कारण मलेरिया रोग फिर से पैदा हो सकता है। जिन क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर मलेरिया का तो उन्मूलन कर दिया गया है परन्तु वहां इसके रोग वाहक मौजूद हैंए वहां पर इस बात की संभावना बनी रहती है कि स्थानीय स्तर पर ही जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से मलेरिया फैल जाए।

डेंगू कारक और अन्य अरबो वायरस : भारत में डेंगू महामारी व्यापक रूप से फैलती जा रही है। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि यह घटना जलवायु परिवर्तन से या आधारभूत ढांचे की असफलता से जुड़ी है परन्तु भविष्य के बारे में अगर अनुमान लगाएं तो इस मुद्दे पर काफी प्रकाश पड़ता है। जलवायु कारकों से कुछ वायरस (मच्छर जनित) एनसिफीलिटिस जैसे सेंट लुईस ऐनसिफालिटस वाइरस और पश्चिमी नील वायरस काफी प्रभावित होते हैं। ये दोनों ही सूखे की स्थिति से जुड़े हैं और यह पाया गया है कि जब अमेरिका में 1999 की गर्मियों में पश्चिमी नील वायरस दिखाई दिए तब न्यूयार्क में जुलाई में बहुत ज्यादा गर्मी रिकॉर्ड की गई थी। सूखे के बाद मध्यपूर्व और पूर्वी यूरोप में महामारी भी फैली थी।

जूं जनित रोग : जलवायु परिवर्तन का बहुत से जूं जनित रोगोंए विशेषकर लाईमी (स्लउम) रोगए रॉकी पर्वत धब्बा बुख़ार और जूं जनित एनसिफीलिटिस पर संभावित असर देखने के लिए लोगों में बहुत उत्सुकता हैं। जूं के वितरण के लिए तापमान और आर्द्रता मुख्य निर्धारक तत्व है। स्वीडन में स्थानीय जूं रोग वाहक के वितरण की उत्तरी सीमा के विस्तार और उसके बढ़ते मामलों का कारण हल्की सर्दियों को माना गया है। यूरोप में जूं जनित एनसिफीलिटिस का सांख्यिकीय मॉडल यह दर्शाता है कि यद्यपि इस रोग के कारक उच्च अक्षांशों और देशांतरों की ओर फैल सकते हैंए फिर भी जलवायु परिवर्तन जूं के जटिल जीवन चक्र को प्रभावित कर सकता है और यह रोग अधिकांशतः मध्य यूरोप से गायब भी हो सकता है।

जल से जुड़े रोग : संसार भर में लगभग एक बिलियन लोगों के पास स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होने की कमी है। जल के दबाव पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की मॉडलिंग यह दर्शाती है कि जलवायु परिदृश्य में काफी विभिन्नताएं हैं। अध्ययन में पाया गया है कि दक्षिण और पश्चिम अफ्रीका और मध्यपूर्व के देशों में जल के दबाव के बढ़ने की संभावना उत्पन्न हो सकती है। यद्यपि यह मुश्किल है कि इस परिघटना को प्रत्यक्ष रूप से जल जनित रोगों के जोखिम से जोड़ दिया जाए। संसार के विभिन्न भागों मेंए यदि सर्दी के महीनों में बाढ़ की घटना में वृद्धि हो जाती है और गर्मियों में सूखे के महीने बढ़ जाते हैंए तब कुछ देशों में तो पानी से होने वाले रोग भी उत्पन्न हो सकते हैं और जनता को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका और विश्व के अन्य भागों में भारी वर्षा के कारण क्राइप्टोपोराइडोसिस के मामले सामने आए हैं।

कुपोषण : संयुक्त राष्ट्र खाद्य व कृषि संगठन के अनुसार विकासशील देशों की 790 मिलियन जनता कुपोषण की शिकार है। खाद्य उत्पादन पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अध्ययन यह बताते हैं कि उच्च व मध्य अक्षांशों पर तो खाद्य अनाज की उपज बढ़ने की संभावना है पर इसके निम्न अक्षांशों पर कम होने की संभावना है। एक विशेष चिंता की बात यह है कि अफ्रीकाए एशिया और दण् एशिया में जलवायु परिवर्तन पोषण स्तर को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। इसका मुख्य कारण है सूखे का प्रकोप लगातार तेजी से बढ़ते जाना।

जलवायु परिवर्तन को कम करना : कम करने का अर्थ है वे नीतियां जिनके कारण ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम किया जा सके ;ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देना और नवीनीकरण ऊर्जा स्रोतों का प्रयोगद्ध। अमेरिका के संदर्भ में यह बात विशेष तौर पर लागू होती है क्योंकि वह विश्व की लगभग 25 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन करता है। यद्यपि ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए नीति बनाने के बारे में चर्चा करना एक बिल्कुल ही अलग मुद्दा हैए इस बात को रेखांकित करना चाहिए कि ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में कमी आने से वायु प्रदूषण कम होगा जिससे कि मानवता को तत्काल लाभ मिलेगा। इन लाभों का अनुपात इस बात पर निर्भर है कि हम किन.किन ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग कर पाते हैं।

निष्कर्ष : हमें इस बात को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि दीर्घ अवधि का जलवायु परिवर्तन जलवायु से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में और बढ़ोतरी कर सकता है और स्थिति और भी भयावह हो सकती है। गर्म हवाओं की पहले से ही चेतावनी उसके प्रभाव को कम कर सकती है। संक्रामक रोगों की संख्या के वितरण को प्रभावित कर सकता है। जलवायु के परिवर्तन के संदर्भ में इस ज्ञान को  व्यवहार में लाकर ही हम जलवायु परिवर्तन का सही ढंग से मुकाबला कर सकते हैं।

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