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भारत का मानचित्र निर्माण करने की गाथा तथा योगदान

प्राचीन भारत की उपजाऊ भूमि ने शून्य की अतिसूक्ष्म अवधारणा को जन्म दिया जो कि अपने आप शून्य मात्र था किन्तु उसमें अनन्त संभावना छिपी हुई थी। बहुत बाद में 7वीं शताब्दी में सबसे पहले ब्रह्मगुप्त ने इस अवधारणा को गणित के साथ समेकित किया। विभिन्न समयों और विभिन्न स्थानों पर इसे सिफ्र, जेफाइरम, जिफ्र, जेनेरो, जीरो नाम से जाना जाता रहा था और अरब के गणितज्ञों द्वारा शून्य को अपनी गणना में स्थान दिया जाने लगा और वहां से चार शताब्दी से अधिक समय बीत जाने के बाद पश्चिमी गणितज्ञों के हाथ लगा। उस समय कुल सात ग्रह ज्ञात थे – सूर्य, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, वृहस्पति और शनि। प्राचीनतम संरक्षित कार्य के लेखक आर्यभट्ट ने 5वीं शताब्दी में गणित और खगोलविज्ञान पर कार्य करते हुए अंतरिक्ष में ग्रहों की स्थिति को क्रमबद्ध रूप प्रदान किया। उन्होंने पृथ्वी की परिधि, पृथ्वी की अक्षीय धुरी, सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने के क्रम में ग्रहीय कक्षाओं की त्रिज्या, ग्रहों की अंडाकार कक्षाओं की गणना की और सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के कारणों की खोज की। वराहमिहिर ने भी अपनी प्रबंध पुस्तक, पंचसिद्धन्तिका जिसमें विश्व के बारे में प्राचीन विचारों को संकलित किया गया है में पृथ्वी के गोलाकार होने का उल्लेख किया है। इसमें बताया गया है कि उत्तरी ध्रुव पर पृथ्वी का उच्चतम बिन्दु मेरू पर्वत है। वहां से चारों दिशाओं में चार महाद्वीप फैले हुए हैं। जम्बु द्वीप दक्षिणी महाद्वीप है जहां मानवों का निवास है। इस प्रकार से हमें प्राचीन समय में ब्रह्माण्ड के भौतिक और पराभौतिक दोनों स्वरूपों की जानकारी थी, हम यह मानते थे कि हमारा उपमहाद्वीप उत्तर में पर्वतों से घिरा हुआ है जहां से जलधारा जो हमारे जीवन को पोषित करती है, नीचे की ओर बहते हुए सागर में मिल जाती है।

नई दुनिया

सन् 1350 के आस-पास यूरोप में पुनर्जागरण काल शुरू हुआ। नई जगहों को जीता जाने लगा और नौवहन, खगोलविज्ञान और तोपखाने की जरूरत निरन्तर महसूस की जाने लगी। वर्ष 1400 से 1700 की अवधि के बीच दूरबीन की डिजाइन और निर्माण, चुम्बकीय दिक्पात, समय की माप, माप की इकाईयों का मानकीकरण और रेखांश का निर्धारण तथा सर्वेक्षण उपकरणों के क्षेत्र में विकास का दौर था। मानचित्र ‘नई दुनिया के उपनिवेशीकरण का एक अभिन्न अंग बन गया था। मानचित्र निर्माण न  केवल नौवहन के लिए जरूरी था बल्कि मापन, नामकरण और मानचित्र निर्माण के  कार्य से औपनिवेशिक विजय का मार्ग प्रशस्त होता था। उस समय तो यह एक तथ्यात्मक स्थिति बन गई थी – जिस क्षेत्र का भी मानचित्र बन गया, उस पर शासन कायम हो गया। वर्ष 1700 के बाद भूगणित का नया युग शुरू हुआ।

भारत का मानचित्र निर्माण किया जाना

याम्योत्तर 78 डिग्री पर अवस्थित हिन्दुस्तान के सर्वेक्षण की योजना बनाई गई। इस विशाल महाद्वीप का सर्वेक्षण महामहिम के 33वें रेजीमेंट के एक अधिकारी 50 वर्षीय ब्रिगेड-मेजर विलियम लैम्बटन के विशुद्ध और यथार्थपरक गणितीय सिद्धान्तों के आधार पर किया जाना था। इस प्रकार से व्यापक त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण का कार्य शुरू हुआ। इस गतिविधि को ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पूरा समर्थन प्राप्त था जिसे भारतीय उपमहाद्वीप एक अति वांछनीय प्रदेश लगा था। जबकि, लैम्बटन के लिए यह भूगणित अन्वेषण  के लिए महान अवसर था। लैम्बटन एक शिष्ट व्यक्ति था जिसमें असाधारण वैज्ञानिक जिज्ञासा व्याप्त थी और उसने खगोलविज्ञान, भूगोल और गणित का अपने ही स्तर पर अध्ययन किया था और वह भी उन्नीसवीं सदी के दौरान पृथ्वी पर कुछ कर दिखाने की धारणा से ग्रसित था।

मानचित्र शक्ति है

ब्रिटिश सेना, एक मानचित्र जिसमें भूमि के क्षेत्रफल को कम करके दिखाया गया था और स्थलाकृति को बदल दिया गया था, से भ्रमित होकर टीपू सुल्तान से मिली हार से अभी भी उबरने की कोशिश कर रही थी। अतः मानचित्र निर्माण पर और ध्यान देने की जरूरत महसूस की जाने लगी खासकर भारतीय रियासतों के बारे में अधिक भौगोलिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी। जेम्स रैनेल द्वारा तैयार मानचित्र जिसे काफी प्रशंसा मिली थी, में काफी गलतियां थी जिसमें प्रमुख स्थानों की सही स्थिति नहीं दर्शायी गई थी और उपमहाद्वीप की चौड़ाई में 40 मील का अन्तर कर देने की भूल हो गई थी। सर्वेक्षकों ने मैरीना बीच के रेत से अपनी यात्रा की शुरूआत करके हिमालय की ऊँचाई तक पहुचने का क्रम जारी रखा, यह यात्रा पूरी करने में 50 वर्षों से अधिक का समय लगा।  मानचित्र निर्माण का कार्य दो अक्षांशों और दो रेखांशों – उत्तर दक्षिण और पूर्व-पश्चिम को मापकर उनके बीच एकडिग्री की लम्बाई का निर्धारण करके शुरू किया गया। त्रिभुजाकार आधार पर पूरे महाद्वीप की गणना की गई, यह एक उलझनभरी गणना थी। इसे सभी अन्य सर्वेक्षणों का आधार बनाया गया क्योंकि इसे किसी भी दिशा में कितनी भी दूरी तक सही सही विस्तारित किया जा सकता था।

संकटपूर्ण स्थिति

सर्वेक्षकों और उनके आदमियों को अज्ञात खतरे से जूझना पड़ता था। उन्हें उफनती नदियों को पार करना पड़ता था, जंगलों के अन्दर भयंकर खतरे उठाने पड़ते थे, वे लोग बुखार से पीड़ित हो जाते थे, कोई चिकित्सा उपलब्ध नहीं हो पाता था। वे लोग सशस्त्र रक्षकों के साथ आगे बढ़ते थे, उन्हें हथियारों से लैस लुटेरों से लड़ना पड़ता था। बाघों, चीतों, भालुओं, रीछों, सांपों और बिच्छुओं से जानलेवा मुकाबला करना पड़ता था। धूल और चिलचिलाती धूप में अपनी यात्रा के दौरान उन्हें भोजन और पानी की कमी का भी सामना करना पड़ता था। कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे, फिर भी मानचित्र निर्माण का कार्य जारी रहा।

आगरा के समीप पहुंचने के बाद जॉर्ज एवरेस्ट बीमार पड़ गया और 1825 में वह इंग्लैंड चला गया। इंग्लैंड में अगले पांच सालों से उसने उपकरणों के बारे में अध्ययन किया, उपकरण खरीदा, उसमें प्रयुक्त विधियों का विश्लेषण किया और उस समय के प्रख्यात वैज्ञानिकों के साथ विचार विमर्श किया। 1830 में भारत वापस आने पर, उसने अपनी सारी योजनाओं को लागू कर दिया और भारत के मानचित्र निर्माण के कार्य में विशुद्धता के स्तर को प्राप्त किया। वर्ष 1841 तक एवरेस्ट का ग्रिड पूरा हो चुका था और कन्याकुमारी से हिमालय के बानोग तक लैम्बटन के महान आर्क का माप किया जा चुका था। जॉर्ज एवरेस्ट अपने विश्वासपात्र एन्ड्रेयूवां को महासर्वेक्षक का पदभार सौंपकर वापस इंग्लैंड चला गया।

पर्वत का नाम एवरेस्ट रखा गया

एन्ड्रेयूवॉ के अधीन एक नये चरण की शुरूआत हुई। त्रिभुज सर्वेक्षण की पूर्वी-पश्चिमी श्रृंखला की शुरूआत नेपाल की सीमा पर देहरादून से की गई। 79 हिमालय की चोटियों का प्रेक्षण किया गया और उनमें प्रत्येक चोटी की पहचान के लिए अलग अलग रोमन अंक आवंटित किए गए। वर्ष 1856 में, प्रेक्षणों के चार वर्षों के बाद घोषणा की गई कि एक चोटी विश्व का सबसे  ऊँचा पर्वत है और उसका नाम पूर्व के महासर्वेक्षक एवरेस्ट के सम्मान में एवरेस्ट पर्वत रखा गया। उत्साही सर्वेक्षकों, पर्वतारोहियों द्वारा काराकोरम श्रृंखला की खोज की गई, आस-पास के ग्लेशियरों से के1 और के 2 चोटियों की पहचान की गई। गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के उद्गम के स्रोतों का पता चलना सबसे महत्वपूर्ण खोज थी।

उभरते भारतीय सर्वेक्षक

जब मेजर विलियम लैम्बटन ने भारतीय उप महाद्वीप के सर्वेक्षण का कार्य शुरू किया था, तो भारतीयों को विभिन्न अधीनस्थ कार्यों के लिए नियोजित किया गया था। छोटे-मोटे घरेलू कार्य करने के अलावा, उनलोगों से औजारों और उपकरणों को ढोने, जंगलों की सफाई और माप के कार्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने, हिल स्टेशन बनाने से लेकर सिग्नल भेजने, जंजीरों से भूमि मापने और बेसलाइनों के फैलाव में सहायता करने आदि का कार्य लिया जाता था। बढ़ईयों, लोहारों, मोचियों आदि को उपकरणों की दैनन्दिन मरम्मत करने के लिए काम पर रखा जाता था तथा अन्य लोग जंगलों या आदिवासी क्षेत्रों में रास्ता दिखाने के कार्य के लिए रखे जाते थे और कुछ लोग शिविर क्षेत्रों की रखवाली के लिए नियुक्त किए जाते थे। अंग्रेजी जाननेवाले लोगों को खाता दुरूस्त रखने और कार्य की डायरी लिखने के लिपिकीय कार्यों या मुंशी के रूप में कार्य करने या यात्रा विवरण का रिकार्ड लिखने के लिए नियुक्त किया जाता था। राजस्व सर्वेक्षणों के लिए शिक्षित भारतीयों को उप-सर्वेक्षकों के रूप में नियुक्त किया जाता था, उन्हें देशी (नेटिव) सर्वेक्षक भी कहा जाता था, उनसे फील्डवर्क में सहायता ली जाती थी। दूसरी तरफ, प्रेक्षण संबंधी सभी महत्वपूर्ण कार्य केवल अंग्रेजों या फिर उनके यूरोपीयन परिजनों के द्वारा किये जाते थे।

जॉर्ज एवरेस्ट दो भारतीयों जिनके नाम मोहसिन हुसैन और राधानाथ सिकदर थे, से अत्यधिक प्रभावित थे। मोहसिन हुसैन मद्रास की एक ज्वेलरी की दुकान में कार्य करता था जहां से 1824 में सर्वेक्षक कार्यालय में कार्य करने के लिए ले जाया गया था और उसे उपकरणों के मरम्मत के कार्य में लगाया गया और बाद में वह कम्पनी के चीफ मैथेमेटिकल इन्स्ट्रूमेन्ट मेकर बने थे। राधानाथ सिकदर ने 1840 में मुख्य गणक के रूप में नौकरी प्रारंभ की। वह गणित के मेघावी ज्ञाता के रूप में उभरे। एक तीसरे भारतीय सैय्यद मीर मोहसिन खान का जन्म आरकोट, मद्रास में हुआ था और उनका परिवार आरकोट के नवाब से जुड़ा था। वर्ष 1824 में उन्हें महासर्वेक्षक, कार्यालय, कलकत्ता में मरम्मतकर्त्ता के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्हें जल्दी पदोन्नित देकर मैथेमेटिकल इन्ट्रूमेन्ट मेकर बना दिया गया। एवरेस्ट ने उन्हें नये उपकरणों और बेसलाइन उपकरणों के मरम्मत तथा उन्हें एडजस्ट करने के साथ-साथ पुराने उपकरणों के निर्माण कार्य के लिए विशेष रूप से उपयोगी पाया।

एवरेस्ट जो सदैव यात्रा पर रहते थे, ने अपनी चलती-फिरती कार्यशाला में अपनी सहायता के लिए देशी बढ़इयों, लुहारों और फिटरों की भर्ती करते रहते थे और उनमें से अधिकतर को दोषपूर्ण खगोलीय उपकरणों को दोबारा से बनाने के लिए कलियाना में बैरों के अधीन कार्य करने के लिए तैनात कर दिया जाता था। इन्हीं व्यक्तियों में से एक सब असिस्टेंट सैयद मोहसिन था जो स्वाभाविक रूप से कुशाग्र बुद्धि का तेज गति से काम करने वाला था। दूसरा व्यक्ति कुसियाली नामक युवा था जो सर्वेक्षकों द्वारा नियोजित लुहारों का प्रधान हुआ करता था। तीसरा व्यक्ति रामदीन था जो अधीनस्थ कर्मकार था और चौथा रामाधीन, सर्वेक्षक महासर्वेक्षक के कार्यालय का प्रमुख बढ़ई था। पांचवा जवाहिर था जो बड़ा ही सुयोग्य और विशेषज्ञ टर्नर, फोरमैन और लुहार था।

खोजपरक सर्वेक्षण

1832 में अलेक्जेंडर बर्न्स ने अफगानिस्तान और तुर्केनिस्तान की यात्रा की थी और उसने अपनी यात्रा के दौरान दो भारतीयों, मोहम्मद अली जो बम्बई में इंजीनियर था और मोहन लाल जिसने चार्ल्स ट्रेवेलियन के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त की थी, की सहायता ली थी।

मोहनलाल एक तेज और प्रसन्नचित व्यक्ति था और उसने काबुल, बुखारा और माशेद की यात्रा तथा हेरात, कांधार और पेशावर होकर  की गई वापसी यात्रा की विस्तृत डायरी लिखी है। उसके द्वारा लिखा गया यात्रा विवरण 1834 में कलकत्ता में प्रकाशित हुआ था जो तुर्किस्तान और उसके लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी देता है।

हिमालय क्षेत्र में आने वाले खोजकर्त्ता

इस क्षेत्र में पहला अभियान शुरू करने वाला मुहम्मद-ए-हामेद था जिसने काराकोरम दर्रा होकर लद्दाख से यारकन्द की यात्रा की थी और यारकन्द का अक्षांश बिन्दू निर्धारित किया था। हालांकि, यात्रा से वापस आने के तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई थी। यद्यपि उस समय तिब्बत एक रहस्यमयी प्रदेश हुआ करता था जिसमें यूरोपवासियों को नहीं आने दिया जाता था लेकिन भारतीयों के लिए मनाही नहीं थी। कैप्टन मॉन्टेगोमेयर, जो कश्मीर सर्वेक्षण का प्रभारी था, ने इस बात पर गौर किया कि भारतीय व्यक्ति व्यापारियों और भिक्षुकों के वेश में उस अज्ञात देश की यात्रा करके वहां के बारे में जानकारी जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उसने हिमालय की ऊपरी घाटी के दो भाइयों – पंडित नयन सिंह और पंडित किशन सिंह को इस कार्य के लिए नियुक्त किया। दोनों भाइयों को उपकरणों के प्रयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया गया और 1865 से 1892 के बीच उन लोगों ने बहुत सारे खोजपरक अभियान पूरे किए और गुप्त सर्वेक्षणों की कला में नया पदचिन्ह कायम किए। नयनसिंह ने प्रार्थना चक्की जो एक समर्पित बौद्ध अपने पास रखता है, का प्रयोग किया और वह 1865 में ल्हासा की यात्रा के दौरान अपनी चक्की को घुमाता रहता था। काठमाण्डु से लहासा और वहां से मानसर झील और फिर वापसी की यात्रा के दौरान उसने कुल 1200 मील की दूरी तय की और वह यात्रा उसकी खोज का एक उत्कृष्ट अभिलेख है जिसमें तिब्बत जाने के दक्षिणी व्यापार मार्ग और सांगपो जल मार्ग का ब्यौरा दिया गया है। दिन भर के प्रेक्षणों को वह अपने प्रार्थना मनके में रिकार्ड करता था, और वह मनका एक ठप्पी से बन्द कर देता था ताकि दूसरों को उसके बारे में पता नहीं चल सके। यह एक नया तरीका था और ये अभिलेख न सिर्फ अज्ञात भूमि के बारे में बल्कि वहां रहने वाले लोगों के जीवन तथा उनके रीति-रिवाजों के बारे में दिलचस्प जानकारी देते हैं और साथ ही इनसे यह भी पता चलता है कि ये यात्री किस प्रकार कठिन स्थितियों में अपनी यात्रा करते थे।

पंडित किशन सिंह की पहली महत्वपूर्ण यात्रा 1872 में शुरू हुई जब उन्होंने सांगपो, के उत्तर में स्थित शिगास्ते से टेंगरीनोर के तटवर्ती क्षेत्रों से गुजरते हुए सर्वेक्षण यात्रा की थी और वह उत्तर की ओर से 320 मील लम्बी तथा कुल 12,000 वर्ग मील का क्षेत्रफल तय करते हुए लहासा पहुंचे थे। उन्होंने आगे 1878-82 के दौरान तिब्बत तथा मंगोलिया की यात्रा की, जहां उन्होंने चार वर्ष बिताए और अचानक वह चीन के क्षेत्रों से बाहर आ गए। उनके द्वारा किए गए खोजपरक कार्य से इरावती और ब्रह्मपुत्र नदियों से जुड़ी भौगोलिक समस्याओं का समाधान करने में मदद मिली। उन्होंने यह भी खोज की कि सांगपो नदी का उद्गम स्थल मानसरोवर झील है और वह ग्याला जाकर समाप्त होती है तथा इस नदी की कुल लम्बाई 850 मील है। किशन सिंह को राय बहादुर की पदवी दी गई। बहुत सारे अन्य खोजकर्त्ताओं को इन दो प्रमुख खोजकर्त्ताओं की ओर से प्रशिक्षण दिए गए या उन लोगों ने नये क्षेत्र खोज किए तथा वापस आकर उन्होंने बहुत सारी उपयोगी जानकारी दी। इन खोजकर्त्ताओं में कल्याण सिंह, रिनजिन नाग्याल, उग्येन जिंतसो, मिजा शुजा, अता मोहम्मद, अब्दुल सुभान और अन्य के नाम उल्लेखनीय हैं। उनलोगों के खोजपरक कार्यों से भारत के मानचित्र निर्माण , भारतीय सर्वेक्षण के विकास और उपलब्धियों में काफी योगदान मिला।

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