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ऋणात्मक तेल मूल्य के क्या मायने हैं?

कल्पना कीजिए कि आप किसी दुकान पर जाते हैं और दुकानदार से एक चॉकलेट मांगते हैं जिसका मूल्य दस रुपये है। दुकानदार आपको मुफ्रत में चॉकलेट देता है, साथ में आपको पांच रुपये भी देता है। आपका हैरान होना स्वाभाविक है। आप यह सोचेंगे कि क्या ऐसा संभव है। वैसे वास्तविक दुनिया में तो यह संभव प्रतीत नहीं होता, परंतु अमेरिका में अप्रैल 2020 में कच्चा तेल के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। हम सबने कुछ दिन पहले पढ़ा कि अमेरिका में तेल का मूल्य शून्य से नीचे चला गया और 20 अप्रैल, 2020 को यह लुढ़क कर -37 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। हाल में तो रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि मई 2020 में यह -100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी छू सकता है।  यह खबर तो वास्तव में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है, आंशिक तौर पर भारत के लिए भी। तेल आय पर निर्भर विश्व की कई अर्थव्यवस्थाएं इससे प्रभावित हो सकती हैं और इन देशों से भारत में आने वाली रैमिटैंस भी प्रभावित हो सकती है। परंतु ये तो हुयी भविष्य की बात। आईए जानें कि आखिर ऋणात्मक  तेल मूल्य क्या होता है और इसके क्या मायने है? यह हुआ कैसे? इन प्रश्नों का जवाब जानने के लिए हमें तेल मूल्य प्रणाली को समझना जरूरी है।

तेल मूल्य ऋणात्मक कैसे?

दरअसल 20 अप्रैल, 2020 को अमेरिका में ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ (डब्ल्यूटीआई) क्रूड, जो कि अमेरिका में तेल मूल्य निर्धारण का मानक यानी बेंचमार्क है, का मई माह का वायदा मूल्य (फ्युचर प्राइस) शून्य से नीचे चला गया था। कच्चा तेल का मूल्य वायदा कारोबार के आधार पर ही निर्धारित होता है। चूंकि मई माह का वायदा कॉन्ट्रैक्ट 21 अप्रैल को खत्म होने वाला था। ऐसे में वायदा अनुबंध करने वाले कारोबारियों के समक्ष दो ही विकल्प मौजूद थेः या तो वह अनुबंध के मुताबिक कच्चा तेल ले लें या फिर अगले माह में रोलओवर करे। तेल खरीदने का वादा करने वालों के समक्ष समस्या यह थी कि इन तेलों को भंडारित करने के लिए जगह ही नहीं बची थी। ऊपर से इन तेलों के ले जाने पर लगने वाला परिवहन लागत अलग से देनी पड़ती। परंतु यहां सवाल उठता है कि पहली बार ऐसा हुआ क्यों? इसकी नौबत आयी ही क्यों? इसका जवाब है कोविड-19 पैंडेमिक। दरअसल कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए मानवीय व औद्योगिक गतिविधियां कम हो गईं है। गाडि़यां काफी कम चल रही हैं। इससे तेल की मांग में 30 प्रतिशत की कमी आयी है। एक ओर जहां तेल का उत्पादन जारी है वहीं इसकी खपत कम हो रही है। जाहिर है उत्पादन व उपभोग के बीच का जो अंतर है वह भंडारित हो रहा है, जिसकी अपनी सीमाएं है। उत्पादित तेल के भंडारण के लिए अमेरिका में जगह कम पड़ रही हैं। तेल उपभोग हो नहीं रहा है। ऐसे में कारोबारियों ने अपने कॉन्ट्रैक्ट का भी तेल लेने से मना कर दिया, जबकि उत्पादक उन्हें इसके बदले डॉलर भी देने को तैयार थे। इसलिए डब्ल्यूटीआई तेल मूल्य शून्य से नीचे चला गया।

विश्व के अन्य देशों में स्थिति

अमेरिका में भले ही तेल का मूल्य शून्य से नीचे चला गया हो परंतु वैश्विक स्तर पर ऐसा नहीं हुआ। इसके कई कारण थे। एक तो यह कि विश्व के अधिकांश देशों में डब्ल्यूटीआई के बजाय ब्रेंट क्रूड को बेंचमार्क मूल्य माना जाता है जिसके अधिकांश उत्पादक खाड़ी देश हैं। दूसरा यह कि, वैश्विक स्तर पर उत्पादित तेल के भंडारण के लिए पर्याप्त जगह है। लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिकी तेल मूल्य का प्रभाव ब्रेंट पर नहीं पड़ा है। ब्रेंट के मूल्य में भी लगभग 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह वर्ष 2001 के स्तर से भी नीचे चला गया। वैसे वैश्विक स्तर पर तेल के मूल्य में कमी पहले से ही जारी है। ओपेक प्लस देशों के बीच उत्पादन में कमी लाने पर आम सहमति नहीं होना इसका एक बड़ा कारण है। सऊदी अरब एवं रूस तेल उत्पादन में कमी पर सहमत नहीं हो रहे हैं।

भारत की स्थिति

भारत अपनी तेल आवश्यकता का अधिकांश आयात करता है। भारत, विश्व में तेल का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। ऐसे में भारत के लिए अच्छी खबर है। हालांकि भारत अपनी तेल आवश्यकताएं खाड़ी देशों से पूरा करता है और ब्रेंट बेंचमार्क को अपनाता है, इसलिए ऋणात्मक डब्ल्यूटीआई का अधिक असर यहां देखने को नहीं मिला। फिर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल का मूल्य काफी कम हुआ है। ऐसे में भारत को चाहिए कि इस समय अपना सामरिक तेल भंडार को पूरी तरह भर ले। इससे तेल आयात बिल को कम करने में मदद मिलेगी। परंतु इसका दूसरा पक्ष भी है। जिन देशों से भारत तेल आयात करता है, उन देशों से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) एवं विदेशी संस्थागत निवेश (एफपीआई) भी होता है। स्वाभाविक है कि इन पर असर पड़ेगा।  साथ ही इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय कार्य करते हैं और ये भारतीय बड़ी मात्रा में धन भी अपने घर भेजते हैं जिसे रैमिटेंस कहा जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में इस रैमिटेंस की भी अहम भूमिका है। इसलिए तेल मूल्य में अधिक गिरावट भी भारत के अच्छी खबर नहीं हो सकती।

वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ (डब्ल्यूटीआई) क्रूड व ब्रेंट क्रूड तेल में अंतर

डब्ल्यूटीआई अमेरिकी बेंचमार्क तेल मूल्य है वहीं ब्रेंट क्रूड वैश्विक बेंचमार्क तेल मूल्य है जिसका अनुपालन विश्व के अधिकांश देशों द्वारा किया जाता है। डब्ल्यूटीआई में कारोबार करने वाला तेल अमेरिका में उत्पादित होता है वहीं ब्रेंट क्रूड उत्तरी सागर से प्राप्त होता है। ब्रेंट क्रूड में डब्ल्यूटीआई की तुलना में अधिक सल्फर होता है। इसके अलावा डब्ल्यूटीआई की तुलना में ब्रेंट में एपीआई (अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट) ग्रैविटी अधिक होती है जिस वजह से डब्ल्यूटीआई अपेक्षाकृत हल्का होता है। अर्थात इसका मतलब यह है कि डब्ल्यूटीआई तेल अधिक स्वीट है। इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर ब्रेंट तेल की अधिक मांग है और विश्व के अधिकांश देशों में यही बेंचमार्क मूल्य भी है। इसलिए इसका मूल्य भी अधिक है।

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