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जलवायु परिवर्तन रोकने को घटे कार्बन की मात्रा

वैश्विक मंचों पर भारी प्रयास किए जाने के बावजूद कार्बन डाई-ऑक्साइड पैदा होने की घटना को विनियमित किए जाने के मुद्दे का समाधान नहीं हो पाया है। कार्बन की मात्रा घटाने और आर्थिक विकास के बीच के द्वंद ने बहस को और अधिक जटिल बना दिया है। इस लेख में कार्बन डाई-ऑक्साइड को जमीन के नीचे गहरा दबा देने की संभावना सहित इसके पैदा होने की मात्रा को घटाने की क्रियाविधियों के रूप में कई विकल्प सुझाए गए हैं।

अत्यधिक अन्तर्राष्ट्रीय विनियमों, सम्मेलनों, संगोष्ठियों और अनुसंधान के बावजूद वायुमण्डल में बढ़ गयी कार्बन की मात्रा को विनियमित करके जलवायु परिवर्तन को रोकना संभव नहीं हो पाया है। कार्बन का जमा होना एक जेनरिक शब्द है जो ग्रीन गैस उत्सर्जन में कमी या समाप्त होने के मूल्य की परख करता है। एक कार्बन क्रेडिट एक टन CO2 के समतुल्य या कुछ बाजारों में CO2 के समतुल्य गैसों के समतुल्य होता है। कार्बन जमा प्रणाली के अंतर्गत, वैसे उपयोगों जिनमें कोई लागत अन्तर्ग्रस्त नहीं होती, की अपेक्षा कम उत्सर्जनों की दिशा में या कम कार्बन की गहनता वाले दृष्टिकोण के संदर्भ में बाजार तंत्रों के माध्यम से औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रक्रियाओं को सीमित किया गया है। जलवायु परिवर्तन रोकने को कार्बन डाई-ऑक्साइड पैदा होने की मात्रा में कमी आने से अन्ततः बिजली उत्पादन में कमी लानी पड़ेगी जिसके कारण आज के वाणिज्यीकृत और औद्योगिकीकृत विश्व में किसी राष्ट्र का आर्थिक विकास बाधित होगा।

ऐसी परिस्थितियों में क्या कोई भी राष्ट्र कार्बन की मात्रा को कम करने पर राजी होगा जिससे उसके आर्थिक विकास की गति बाधित होगी? एक विकल्प तो यह है कि पारम्परिक स्रोतों के उपयुक्त प्रतिस्थापन के तौर पर गैर-पारम्परिक बिजली के दूसरी बार पैदा होने वाले स्रोतों के उपयोग को अनिवार्य बनाया जाए।

हरित ऊर्जा : जैव पेट्रोल और जैव डीजल के उत्पादन से अतिरिक्त कृषि मांग पैदा होती है। सबसे बड़ी बात है, 5-10 प्रतिशत अतिरिक्त मात्रा के रूप में प्रयुक्त किए जाने से हमारी जरूरतें नहीं के बराबर पूरी हो पाती हैं। इसके स्थान पर लिग्नों सेल्युलेसिक तेल (डाइकेथिलफुयुरान) जोकि ऊर्जा फसलों (ऊर्जा उत्पादन के लिए कम लागत तथा कम रखरखाव वाले अखाद्य पदार्थों को उगाया जाना) से प्राप्त दूसरी बार पैदा होने वाला जैव-ईंधन है और कृषि अवशिष्टों से प्राप्त प्रथम ईंधन नहीं। इसे ‘ग्रासोलिन’ नाम दिया गया है जो प्रत्येक प्रकार का तरल ईंधन जैसे एथेनॉल, डीजल और गैसोलीन तथा जेट ईंधन प्रदान कर सकता है, और जो गैसोलिन के वास्तविक प्रतिस्थापन के तौर पर उभर रहा है। उच्च तापमान की सौर ऊर्जा के सान्द्रण के द्वारा तरल ईंधन के निरंतर स्राव के लिए तेजी से बढ़ने वाले द्विपरमाणुयुक्त शैवाल की वृद्धि करके हमारे जीवाश्म ईंधन को संरक्षित किया जा सकता है तथा साथ ही इससे कार्बन के पुनर्चक्रण में सहायता मिलती है जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम होते हैं। वैद्युतीय शक्ति पैदा करने हेतु सौर और पवन ऊर्जा कुल बिजली उत्पादन के बहुत कम भाग में उपयोग में आती है। हमें अंतरिक्ष में या चन्द्रमा और मंगलग्रह पर उपग्रहों से अबाधित सौर शक्ति पैदा करने के विकल्पों को माइक्रोवेव के माध्यम से भूमि पर स्थित स्टेशनों तक प्रसारित करने के बारे में सोचना चाहिए। क्षोभमंडल के निचले भाग से कुल पैदा होने वाली पवन ऊर्जा वर्तमान में पर्याप्त मात्रा में नहीं होती है। लेकिन हम समतापीय केन्द्र के साथ लगे पृथ्वी पर स्थित केन्द्र के माध्यम से बिजली की आपूर्ति स्थिर बनाने हेतु उच्च गति के झरनों का उपयोग कर सकते हैं। हम लोग प्लाज्मा का गैसीकरण करके कूड़ा-करकट से भारी मात्रा में बिजली पैदा कर सकते हैं। इसमें अन्तर्ग्रस्त लागत कम होने और यह निर्धन देशों के लिए व्यवहारिक होने के कारण इन मुद्दों का समाधान करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

कार्बन को दबाना : बिना कार्बन जलाए – जमीन के नीचे संसाधनों का दोहन करके बिजली पैदा की जा सकती है। भारत में उत्तरी तथा तटवर्ती समतल मैदान के शैल स्तरों में शैल गैस का विशाल भंडार कई बार उपलब्ध प्राकृतिक गैस की मात्रा से कई गुना अधिक हो जाता है। ठोस हाइड्रोजन (मिथाईल हाइड्राइड) महाद्वीपीय मग्नतटभूमि में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। महासागरीय निक्षेपों के गहरे निचले भाग में मिथेन गैस हाइड्रेट पाए जाते हैं। ये स्रोत भविष्य में भारी मात्रा में ऊर्जा की आपूर्ति में सहायक हो सकते हैं। गहरे कोयला खदानों से आपूर्ति की जाने वाली मीथेन के आधार पर एक द्वितीयक बिजली संयंत्र को कोयला आधारित ताप बिजली संयंत्र से मदद मिल सकती है। इसका तरीका यह होगा कि विद्यमान ताप बिजली संयंत्र से प्राप्त CO2 को जमा करके लम्बे समय के लिए कोयला खदानों में वापस भेजा जाता है जिससे मीथेन पैदा होता है जो द्वितीयक संयंत्र के लिए ईंधन का कार्य करता है। अधिक मात्रा में तेल का निष्कर्षण करने के लिए पेट्रोलियम खानों में भी CO2 प्रवेश कराया जाता है। अतः कार्बन की मात्रा के बड़े भाग को नीचे जमीन में दबाने से बिजली निर्गत करने में मदद मिलती है तथा कार्बन उर्त्सजन नियंत्रित होता है। भूगर्भीय पृथक्करण एस्फाल्ट चट्टानों के अलग हुए छिद्रयुक्त स्थानों के रास्ते CO2 के नीचे जाने की बात करता है। भारत का दक्कन क्षेत्र कार्बन डाई-ऑक्साइड को गाड़ने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। तरलीकरण के पश्चात CO2 को बलुआ पत्थर और डोलोमाइट के गहरे छिद्रयुक्त तलहटी चट्टानी स्तरों में पृथक किया जा सकता है। भूमिगत चट्टानी स्तर के नीचे कार्बन की मात्रा का बड़ा भाग को गाड़ना लम्बे समय के लिए कार्बन भंडारण की दिशा में एक अगला कदम है। तापीय संयंत्रों से प्राप्त CO2 को गहरे समुद्र में भेजना सतही जल पृथक्करण के अलावा लौह-निशेचन और कार्बनीकरण के लिए अतिरिक्त पृथक्कीकरण है। कार्बन विघटन से भी जमा कार्बन की मात्रा घट सकती है। ब्व्2 के विघटन करने से सिंथेटिक ईंधन पैदा करने और वायुमण्डल में जमा कार्बन की मात्रा को कम करने में सहायता मिलती है।

भू इंजीनियरिंग : ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती मात्रा के साथ आने वाला सौर विकिरण (सूर्य तपन) से वायुमण्डलीय तापमान बढ़ता है। लैग्रेन बिन्दु पर बड़े परावर्तक (रिफ्लेक्टरों) या पारासोलों को रखे जाने या 200-300 किमी की ऊँचाई पर आयन मंडल में दर्पणों को रखे जाने से सूर्य तपन को अंतरिक्ष में फिर से विकिरित किया जा सकता है। CO2 गर्मी ग्रहण करने के बाद घनात्मक रेडियोधर्मी बल पैदा करता है लेकिन वायु विलय (एयरोसोल) ऋणात्मक रेडियोधर्मी बल है क्योंकि वह सौर किरणों को वापस वायुमण्डल में फिर से भेजने के लिए अलबीडो (सौर-विकिरण की सतह परावर्तिता) के रूप में कार्य करता है। मिसाइलों और जेट विमानों से समतापीय मंडल (स्ट्रेटोस्फेयर) में यदि वायुविलयों के छिड़काव किए जाने से वायुमण्डल के तापमान को घटाने में मदद मिल सकती है, तो आने वाले सौर-विकिरण को फैलाने हेतु सल्फेटों और धूलों का छिड़काव करके समतापीय बादलों को समुद्र के ऊपर भेजा जा सकता है। एक कृत्रिम ज्वालामुखी के माध्यम से धूलों का एक कृत्रिम बादल पैदा करके पृथ्वी की सतह पर सूर्य की गर्मी फैलने से रोका भी जा सकता है। ये विचार नए हैं और इन पर प्रयोग किया जा सकता है। यद्यपि इसके नकारात्मक पक्ष भी हैं जैसाकि वायुमण्डल का विघटन हो सकता है, वर्तमान जलसुग्राही चक्र प्रभावित हो सकता है, समुद्री जल का अम्लीकरण हो सकता है, आदि।

ग्रीन प्रौद्योगिकी : कार्बन का व्यापार और स्वच्छ विकास क्रियाविधि को अपनाना कार्बन की मात्रा कम करने के दो रास्ते हैं, जबकि ऊर्जा की कम खपत और कार्बन का कम उत्सर्जन ग्रीन प्रौद्योगिकी सिद्धान्त हैं। ईंधन सेलों आधारित परिवहन वाहनों जैसी नई पीढ़ी की वर्णसंकर मशीनों, बैटरीचालित प्रचालन और हाइब्रिडों में प्लग के उपयोग तथा सीएफएल के उपयोग से ऊर्जा खपत में काफी कमी लायी जा सकती है।

कोपेनहेगेन सम्मेलन में भारत और चीन ने वर्ष 2020 तक क्रमशः 20 और 40 प्रतिशत कार्बन की मात्रा स्वतः घटाने का प्रस्ताव किया है। अति सक्रिय नवीन प्रौद्योगिकियों को मंजूरी देकर इसे आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, उनमें से बहुत सारी प्रौद्योगिकियों जैसे कि संलयन आयनों और एन्टी मैटर (पदार्थ-रोधी) आधारित परमाणु ऊर्जा के उपयोग किए जाने की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही है।

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