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छत्तीसगढ़ की शिल्प-कला

छत्तीसगढ़ जहां पर 36 किले मौजूद हैं, का क्षेत्रफल 1,35,194 वर्ग किमी है। मेकल, सिहावा और रामगिड़ी पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा तथा बहुत सारी नदियांं – महानदी, शिवनाथ, इन्द्रावती, हासदो और खारून के पानी से सराबोर छत्तीसगढ़ की एक अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है जिसकी शुरूआत पाषाणयुग में हुई थी।

प्राचीन मानवों के प्रमाण राजनंदगांव जिले में अवस्थित रायगढ़, सिंहनपुर, कबरा, बसनाझर, बोसलाडा और ‘चितवानदोंगरी’, के ओंगाना पहाड़ों में मिले हैं। प्राचीन मानवों द्वारा निर्मित और प्रयुक्त पत्थरों के उपस्कर महानदी, मांड, कन्हार, मनिहारी और केलो नदियों के तटों से प्राप्त हुए हैं। सिंहनपुर और कबरा पर्वतों में स्थित शिलाचित्र (रॉक पेंटिंग) से समकालीन चित्रकारों को प्रेरणा मिल रही है, जो हमारे प्राचीन कलाकारों की शिल्प-कला शैली  का अनुसरण करते हैं।

दक्षिण कौशल के रूप में ज्ञात, रामायण में छत्तीसगढ़ का उल्लेख बार-बार आया है। भगवान राम ने अपने वनवास काल बिताने के लिए कोशल के पूर्वोत्तर भाग से दंडाकारण्य में प्रवेश किया था। समुद्रगुप्त प्रयाग स्तुति में कौशल का भव्य वर्णन किया गया है। छठी सदी से लेकर 12वीं सदी के मध्य तक सर्वपूर्णिमा, सोमवंशी, पांडुवंशी, कालचुरी और नागवंशी शासकों का इस क्षेत्र पर आधिपत्य रहा। वस्तुतः विभिन्न दस्तावेज, ताम्रपत्र, सिक्के और पुरातात्त्विक वस्तुओं से हमें उस काल की सांस्कृतिक विरासत और राजनीतिक विकास की जानकारी मिलती है। यह क्षेत्र वर्ष 1732 से लेकर 1818 तक मराठों के शासन के अधीन भी रहा तथा बाद में उसे अंग्रेजों द्वारा नागपुर प्रेसीडेंसी के अधीन ले आया गया था।

दक्कन में अवस्थित, छत्तीसगढ़ जैव भौगोलिक दृष्टि से समृद्ध,शिलप-कला, सांस्कृतिक विरासत एवं प्राकृतिक विविधता जो अपनी समृद्धि और विभिन्नता की दृष्टि से अप्रतिम है। छत्तीसगढ़ के लोगों की नस्लीय विविधता के कारण आमोद-प्रमोद और उत्सवपूर्ण माहौल बना रहता है जो इस राज्य की अद्वितीय विशेषता है। पूरे वर्ष भर छत्तीसगढ़ के जंगलों में विभिन्न त्योहारों और मेला, जैसे कि पोला, नवाखाई, दशहरा, दीपावली, होली और गोवर्धन पूजा की धूम-धाम और उल्लास की गुंज सुनाई पड़ती रहती है। राज्य की कुल जनसंख्या 20.83 मिलियन (2001 जनगणना)  है, जो देश की कुल जनसंख्या का 2.03 प्रतिशत है। 79.93 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या तथा 20.07 प्रतिशत शहरी जनसंख्या है, जबकि जनसंख्या घनत्व 154 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। कुल जनसंख्या का 31.8 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जाति की है और पशुधन की कुल संख्या 13.5 मिलियन है (2003 पशुगणना)। प्रमुख जनजाति समूहों में हिल और बिसोन, होर्न मारियाज, मुरिया गोंड, ध्रुवा, भतरास और हलबास शामिल हैं। जबकि आस-पास के क्षेत्रों के साथ एकीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाने से व्यापारियों जो कि आस-पास के राज्यों की बनिया जाति से ताल्लुक रखते हैं, का आवागमन दिखाई पड़ रहा है। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश से तेलगू भाषी समुदायों ने भी इस राज्य को अपना घर बना लिया है। छत्तीसगढ़ के लोगों का संगीत, नृत्य और मदिरा के प्रति प्रेम ही उनकी विशिष्टता की पहचान है। नई फसल की कटाई के अवसर पर नवाखाना पर्व मनाया जाता है, जिसमें पृथ्वी माता की पूजा-अर्चना की जाती है तथा नई फसल लगाने की अनुमति ली जाती है। जनजाति समाज व्यवसाय आधारित जाति प्रणाली से शासित होता है जहां गड़वा लुहार का काम करते हैं, महार या गंडास-बुनकर का, चमार चमडे़ का, कल्लार और सुन्दी – मदिरा बनाने का, रावत-गौ पालन, प्रत्येक वर्ग जनजाति का सुन्दर संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण सेवा प्रदान करता है। सभी त्योहारों और मेलों के अवसर पर तदबुड़ी और धपरा-ढोलकों की थाप, मुहरी-बांसुरी की धुन और सितार की तान सुनाई पड़ती रहती है। पूरे दिन भर पुरूष और महिलाओं के नृत्य का दौर चलता रहता है तथा भोज होते रहते हैं, जिनमें सुल्फी या महुआ देशी शराब सभी को परोसा जाता है तथा पूरा वातावरण उल्लासपूर्ण बना रहता है।

छत्तीसगढ़ ने अपनी समृद्ध संस्कृति के दर्शन कराते हुए अपने यहां पर्यटन की संभावना बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। छत्तीसगढ़ की शिल्प-कला  ने राज्य के राजस्व में प्राथमिक हिस्सेदारी का योगदान करने के अलावा अपने कारीगरों की निपुणता के माध्यम से पूरे विश्वभर में प्रसिद्धि भी पाने लगी है। लकड़ी पर नक्काशी का कार्य, बांस की बनी वस्तुएं/फर्नीचर, कांसा धातु से बने शिल्प, मृदुभांड की मूर्त्तियां, जनजाति लोगों के आभूषण, पेंटिंग और मिट्टी से बनी वस्तुएं राज्य की कुछ विशेषताएं हैं। विश्वसनीय हस्तशिल्प संस्कृति के किसी अन्य तत्व की भांति पीढ़ियों तक चलता रहता है। प्रत्येक शिल्प-कला की ओजस्विता बीते अन्तहीन कालखंड और समकालीन प्रभावों के बीच समन्वय को दर्शाती है। चूंकि नस्लीय जनसंख्या पारिस्थितिकी प्रणाली के असीमित तौर-तरीकों पर निर्भर करती है, जबकि उनके अन्दर प्रकृति की मौन भव्यता की सहज वृत्ति झलकती है। पर्यावरण की विपुलता  ने अपनी सम्पूर्ण सूक्ष्मता के साथ उन शिल्पकारों की कल्पनाशीलता पर अमिट छाप छोड़ी है। सभी उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों की अधिकतम क्षमता का उपयोग किया गया है, पत्थरों को तराशकर एक परिष्कृत कार्य को अंजाम दिया गया है जो पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। दैनिक उपयोग की लगभग सारी वस्तुएं अपने मूल से हटकर महान सौंदर्यपरक मूल्य का एहसास कराने वाली वस्तुओं के रूप में बदल गई है। इसके परिणामस्वरूप, एक स्वदेशी प्रौद्योगिकी का विकास हुआ है जिसकी संकल्पना तो सरल है किन्तु व्यवहारिक तौर पर वे काफी परिष्कृत हैं। यह चीज अन्य किसी कृति में इतनी स्पष्ट तौर पर परिलक्षित नहीं होती है, जितनी कि उनलोगों के गृह निर्माण में दिखती है। घर के आस-पास बांस की बत्तियों से बाड़ खड़ी की जाती है। उसी प्रकार से सुअरबाडे़ और मुर्गी दरबे बनाए जाते हैं। उन लोगों के घर मिट्टी, लकड़ी, बांस और पुआल से बनाए जाते हैं, ये सारी सामग्री उसी पर्यावरण से प्राप्त होते हैं और उनका निपुणता से उपयोग किया जाता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी कौड़ियों, शीशे और रेशे की सहायता से रोचक वस्तुओं का निर्माण करते हैं जो आधुनिक घरों के सजाने के काम आते हैं। तोरण, दरवाजों पर लटकाए जाने वाले सजावटी सामान, लटकाई जाने वाली चटाइयां, बक्से, बरतन रखने वाले टोकरे, बिछाई जाने वाली  चटाइयां, जाली थैले और तौलिए तथा बहुत सारे उपयोगी शिल्पकृतियां जो बस्तर के दलदल में लहराते सरकंडों से प्राप्त आइवरी सीसल के रेशे से बुनी जाती है, बिक्री के साधन है।

धोकरा शिल्प

कांस्य धातु शिल्प धातु के ढालने की प्राचीनतम ज्ञात विधियों में से एक है। धोकरा वस्तुओं और आकृतियों से मिलते-जुलते धातु से बने टुकड़े हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मिले हैं जिससे इस विश्वास को बल मिलता है कि यह शिल्प- कला संभवतः प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। आज यह शिल्प ललितपुर, रायगढ़, सरगुजा के क्षेत्रों तथा सबसे महत्वपूर्ण रूप में बस्तर में व्यापक तौर पर चलन में है। धोकरा से मुख्य आशय, लॉस्ट वॉक्स तकनीक का प्रयोग करके कांस्य धातु या पीतल को ढ़ाले जाने से हैं। छत्तीसगढ़ का गढ़वा समुदाय इस शिल्प-कला से जुड़ा हुआ है। स्थानीय व्युत्पत्तिशास्त्र (ऐटीमाइलॉजी) में गढ़वा का अर्थ होता है ‘आकार गढ़ना या सृजन करना।’ गढवा द्वारा स्थानीय उपयोग के लिए बहुत सारे उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जैसे स्थानीय देवी-देवताओं की मूर्तियां, बर्तन और आभूषण। पारम्परिक लॉस्ट वॉक्स तकनीक जनजातीय पृष्ठभूमि में प्रयुक्त किए जाने की दृष्टि से सरल और आदर्श तकनीक है। शिल्पकार चिकनी मिट्टी से तैयार आकृति को मोम के पतले धागे से लपेटता है फिर दीमक की बांबी से लायी गयी चिकनी मिट्टी का मोटा घोल उसपर चढ़ाया जाता है और उसे सुखाया जाता है, इस दौरान मोम के पिघलने के लिए छोटी सी सुराख छोड़ दी जाती है। आकृति तथा घोल के स्तर के बीच पैदा हुए खाली स्थान को पिघले धातु से भर दिया जाता है, फिर उसे ठंडा होने तथा ठोस आकार ग्रहण करने के लिए छोड़ दिया जाता है। चिकनी मिट्टी की बाहरी परत को तोड़ दिया जाता है और इस प्रकार अंतिम रूप से सुन्दर मूर्तियां तैयार हो जाती है। यह पूरी प्रक्रिया सरल दिखती है, परन्तु इसमें अत्यधिक कुशलता और सूझ-बूझ बरतने की जरूरत होती है। छोटे-छोटे खाली स्थानों के बीच पिघले धातु को एक समान रूप में फैलना चाहिए और मोम का स्थान लेना चाहिए तथा इस दौरान कोई बुलबुला न बनने पाये या कोई स्थान छुट न जाए। धोकरा शिल्प के निर्माण में गाय का गोबर, धान की भूसी और लाल मिट्टी का भी प्रयोग किया जाता है, गढ़वा द्वारा प्रयोग किए जाने वाले सभी कच्चे मालों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान मधुमक्खी के मोम का है। शिल्पकृतियां तैयार करने के लिए आकृति बनाने के अलावा उसे सजाने में मोम के तारों और टुकड़ों का भी प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि इसमें प्लास्टिक के काफी अंश होते हैं तथा इसके अन्दर लचीलापन होता है जिससे शिल्पकार को अस्थायी किन्तु सशक्त और दुरूह प्रारूप तैयार करने में मदद मिलती है।

लॉस्ट वॉक्स ढालने के उदाहरण (इसे कापरपरड्यू के नाम से भी जाना जाता है) पूरे विश्व में मिलते हैं, लेकिन लच्छेदार धागा तकनीक बस्तर में ही उपयोग में लाया जाता है। पारंपरिक टोकरे से इस शिल्प-कला की उत्पत्ति को आधार मिला। टोकरे बनाने वाले रस्सी में घास को लपेट देते हैं, फिर रस्सी को मोड़ कर विभिन्न आकार दे दिया जाता है। वही तकनीक बाद में धातु शिल्प-कला में अपना ली गयी, क्योंकि निवासी धातु के प्रयोग करने से बहुत पहले से प्राकृतिक उत्पादों का निर्भर कर रहे थे। धातु के बने पायलों जिसमें टोकरी में दिखने वाले दाने के समान डिजाइन बने हुए होते हैं और खपची से बनी सुन्दर-सुन्दर टोकरियां भी इस प्रकार के परिवर्तन की कहानी कहते हैं।

लौह शिल्प

छत्तीसगढ़ की धातु की बनी शिल्प कृतियों और आकृतियों का गहरा रंग उसके अपने ही लोगों की छाप का एहसास कराता है। दोनों में रूखापन लेकिन उनके अन्दर एक आडंबरहीन लालित्य और गरिमा का भाव अंतर्निहित रहता है। आदिवासी लोगों में पर्यावरण के प्रति एक सहज आदर भाव मौजूद रहता है और वह इस बात से दृष्टिगोचर होता है कि इस शिल्प के लिए प्रयुक्त कच्चे माल में प्रमुखतौर पर लोहे का छीजन होता है और चेरांगदुगड़ी का खान इसके आपूर्ति का साधन है। इस शिल्प निर्माण की विधि सरल किन्तु प्रभावशाली है। भट्टियों के अन्दर धातु को पीट-पीट कर लचीला बनाया जाता  है और फिर बमर और सरसी का प्रयोग करके फिर इसे सावधानी पूर्वक आकार दे दिया जाता है। इस शिल्प -कला की कारीगरी इस तथ्य से प्रभावित होती है कि उत्पादों में कहीं भी जोड़ नजर नहीं आता है। उत्पाद के तैयार हो जाने पर इसकी चमक बढ़ाने के लिए इसमें वार्निश की कोटिंग लगाई जाती है। लैम्प, मोमबत्ती स्टैंड, संगीतकारों की मूर्त्तियां, शेरों, बन्दरों और हिरण की आकृति वाले खिलौने, देवी-देवताओं की मूर्त्तियां और अन्य आकृतियां तथा झारी और लामन दीया जैसे कर्मकांड की वस्तुएं इन उत्पादों की श्रेणी में आते हैं। बस्तर के कांंडागांव, गुनागांव और उमारगांव इस शिल्प के प्रमुख केन्द्र हैं।

पक्की मिट्टी की मूर्त्तियां

मिट्टी की मूर्त्ति बनाने की कला छत्तीसगढ़ की कलात्मक अभिव्यक्ति की उत्पत्ति की प्रारंभिक बिन्दु है। यहां के वनों के अन्दर विभिन्न प्रकार की लकड़ियों की भरमार होने तथा धातु अयस्कों से भरपूर होने के बावजूद मृदु मिट्टी से बनाई गई त्रिआयामी आकृतियों से मानव और पर्यावरण के बीच समन्वय प्राप्त करने की जरूरी ललक दिखाई पड़ती है। पक्की मिट्टी के बर्तन अपनी भौतिक आकृति से कहीं अधिक गहरे अर्थ में छत्तीसगढ़ के जनजाति लोगों द्वारा तैयार किए जाने वाले सभी प्रकार के हस्तशिल्पों की परम्परा का बखान करते हैं। पक्की मिट्टी की शिल्पकृतियां तैयार करने के लिए जरूरी विशेषज्ञता और निपुणता कुम्हार समुदाय की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचती रही है। कुम्हारों के कच्चे माल का स्रोत इन्द्रावती नदी है। नदी के ऊपरी भाग की मिट्टी का उपयोग बरतन बनाने वाले चाक और लकड़ी के बने स्पतुला जैसे प्रारंभिक औजारों के माध्यम से शिल्पकृतियां तैयार करने में किया जाता है। धीमी आंचों पर कई घंटे तक पकाने से इन कृतियों में मजबूती आ जाती है। अन्त में उन कृतियों पर नदी की गहराई से लायी मिट्टी का घोल चढ़ाया जाता है जिससे कृतियों में लालिमापूर्ण गेरूआ रंग चढ़ जाता है। कुम्हार सुन्दर-सुन्दर मटका, हंडिया और दीये गढ़ते हैं। हाथियों, घोड़ों, सांडों जैसे जानवरों की आकृतियों के कर्मकांडी स्वरूप तथा मिट्टी के मास्क इस शिल्प-कला की प्रमुख वस्तुओं में से हैं। सुराही और विक लैम्प बनाने में स्वदेशी प्रौद्योगिकी का वृहत परिष्कृत रूप और निपुणता झलकती है। आधुनिक जीवन की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पेन होल्डर, लैम्प और पेपरवेट आदि जैसी समकालीन वस्तुएं भी बनाई जाती हैं।

काष्ठ शिल्प-कला

बस्तर क्षेत्र में शीशम और शिवनी टीक के भारी वन पाए जाते हैं। प्रारंभ में, आदिवासी जंगल की लकड़ियों का उपयोग ईंधन जलाने और घर बनाने में करते थे। समय गुजरने के साथ ही उन लोगों ने लकड़ी में नक्काशी खोदने और काष्ठकला के परिष्कृत रूप को सीख लिया, जिससे उनके बीच इस शिल्प-कला में निपुण बढ़ई समुदाय का अभ्युदय हुआ। फिर बढ़ई के दो समूह – एक कृषि औजार बनाने वाले तथा दूसरे सजावटी और कुल चिंहों के स्तंभ (टोटमिक पिलर) आदि बनाने वाले बन गए। उन लोगों के द्वारा लकड़ी या बांस के बने सरल औजारों का प्रयोग किया जाता है। वृक्षों से छाल उतारने तथा लकड़ी के सतह को चिकना करने के कार्य में कांस को लगाया जाता है। लकड़ी से छाल उतारने, उसकी रगड़ाई करने तथा उसे आकार देने का कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद पोह पिसेल और छोटे-छोटे साला पोह का इस्तेमाल किया जाता है। छोटुल ऐसा स्थान है जहां  बढ़ई की शिल्पकला देखने को मिलती है। मुरिया जहां युवा विश्राम करते हैं और लकड़ी के नक्काशीदार पाठ जिसे कुतुअल कहा जाता है, पर उन लोगों के द्वारा नृत्य किया जाता है तथा नृत्य के दौरान बजाये जाने वाले ड्रम भी लकड़ी के बने होते हैं। आज भी लड़कों द्वारा लड़कियों को अपने प्यार के उपहार स्वरूप लकड़ी की नक्काशीदार कंघी भेंट की जाती है। घोटुल के आनन्ददायक वातावरण के अनुरूप उसके दरवाजों और खंभों पर आनन्ददायक मुद्रा में आलिंगनबद्ध जोड़ियों की प्रेममयी आकृतियां खुदी होती है। इसके साथ-साथ कंघी, सूरज और चन्द्रमा, फूलों और ज्यामिति आकार भी उन पर खुदे होते हैं। उन क्षेत्रों के छतें, दरवाजे और लेंटल विभिन्न प्रकार के लकड़ियों के बने होते हैं, जो बड़े ही सुन्दर और आकर्षक दिखते हैं। शिल्पकार विभिन्न प्रकार की सुगंधित लकड़ियों का प्रयोग करके बांसुरी, मास्क और मूर्त्तियां भी बनाते हैं।

अन्तिम निष्कर्ष

इस क्षेत्र की विशालता, विभिन्न जनजातियां और उनके अलग-अलग सांस्कृतिक रीति-रिवाज, घने दुर्गम्य जंगल और प्राचीन अवशेषों की बहुलता सभ्यताओं का एक बहुरूपदर्शी चित्र प्रस्तुत करती है, जिससे हजारों साल पुरानी आदिम संस्कृतियों की झलक दिखाई पड़ती है। बस्तर का स्वरूप वास्तव में एक फिल्मग्रंथन (मोन्टेज) जैसा ही है,  वहां सड़कों के किनारे हाथों में चमकते लोहे की हंडियों में ताड़ी बेचने वाले दिखते हैं। मछली की पूंछ में मौजूद तेल से बनाया गया सुल्फी और महुआ लोगों का मनपसंद पेय है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा हाल ही में एक शिल्पग्राम की स्थापना की गई ताकि इस क्षेत्र की जनजातीय कला और हस्तशिल्पों को अक्षुष्ण रखा जा सके और उसे बढ़ावा दिया जा सके।

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