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गेहूँ की बर्बादी रोकनी ही होगी

गेहूँ शीतोष्ण कटिबन्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण अनाज है। चीन में इसकी खेती 5000 और भारत में 4000 वर्ष पूर्व से की जा रही है। मोहन जोदड़ो में की गयी खुदाई में जो गेहूँ के दाने मिले हैं उनके अध्ययन के आधार पर इतिहासकारों का मत है कि भारत ही सम्भवतः गेहूँ का आदि स्थान रहा है। वेदों में भी चावल जौ तिल मूंग के साथ गेहूँ का वर्णन मिलता है। कुछ विद्वानों के अनुसार गेहूँ प्रारम्भ में सागरीय प्रदेशों – टर्की, मिश्र, इराक में पैदा किया जाता था। यहीं से गेहूँ की कृषि विश्व के 100 से भी अधिक देशों में की जाने लगी। विश्व की लगभग आधी जनसंख्या अपने भोजन के लिए गेहूँ पर निर्भर है। गेहूँ की  कृषि उत्तरी गोलार्द्ध में 25 डिग्री से 65 डिग्री तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में 20 डिग्री से 45 डिग्री अक्षांशों के बीच की जाती है। उपोष्ण जलवायु प्रदेशों में गेहूँ की कृषि शीतकाल में तथा शीत जलवायु प्रदेशों में वसन्तकाल में की जाती है।

गेहूँ की फसल बोते समय तापमान 10 डिग्री से 15 डिग्री सेन्टीग्रेड और पकते समय 20 डिग्री से 28 डिग्री सेन्टीग्रेड उपयुक्त रहता हैं। पाला फसल के लिए हानिकारक है। वर्षा साधारणतः 50 से 75 सेमीण् आदर्श होती है। फसल पकते समय बादल व वर्षा हानिकारक होते हैं। महीन कांप, चीका प्रधान दोमटए चरनोजम व काली मिट्टियाँ गेहूँ के उत्पादन हेतु उपयुक्त रहती हैं। भूमध्य सागरीय जलवायु गेहूँ की कृषि के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।

स्वभाव, आकृति, रंग आदि के आधार पर गेहूँ की मारक्विस, रिवार्ड, लरमा राजो, सोनेरा 63, सोनेरा 64, सोना 227, कल्याण सोना, सोनालिका, छोटी लरमा, शरबती, सोनेरा, सफेद लरमा आदि 300 से भी अधिक किस्में हैं। विश्व के प्रमुख गेहूँ उत्पादक देश चीन (15 प्रतिशत), भारत (11.6 प्रतिशत), संयुक्त राज्य अमेरिका (10.6 प्रतिशत), कनाडा, रूस, युक्रेन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया, अर्जेन्टीना एवं भूमध्य सागरीय देश हैं। भारत में मोटे तौर पर दो प्रकार के गेहूँ उत्पन्न किया जाता है। प्रथम प्रकार के गेहूँ को साधारण रोटी का गेहूँ कहते हैं। इसका उत्पादन उत्तरी मैदान में होता है। दूसरे प्रकार का गेहूँ मैकरॉनी यडंबतवदपद्ध है जो अपेक्षाकृत कठोरए लाल रंग और मोटे दाने वाला होता है। इसका उत्पादन मध्यप्रदेशए महाराष्ट्रए आन्ध्रप्रदेश व तमिलनाडु में होता है।

विश्व के गेहूँ उत्पादक प्रमुख देशों की सूची में दूसरे स्थान पर होने के बावजूद भारत को अपनी घरेलू आवश्यकता की पूर्ति के लिए गेहूँ का आयात करना पड़ता है। बेमौसम बारिश, बाढ़, सूखा, कीटों के कारण सड़न, उचित भंडारण व्यवस्था न होने से, इन कारणों से देश में प्रति वर्ष लाखों टन गेहूँ की बर्बादी हो रही है। कहीं बारिश में भीग के सड़ रहा है तो कहीं गोदामों में वर्षों पुराना होकर सड़ रहा है, तो कहीं चूहे, दीमक, कीड़े-मकोड़े इतना नुकसान पहुँचा रहे हैं कि इसका आकलन कर पाना मुश्किल है। इतने बड़े नुकसान के बाद भी, गेहूँ की बर्बादी की कहानी वर्षों से जारी है। तमाम कोशिशें के बावजूद गेहूँ के उत्पादन पूरा नहीं हो पाता। शासक वर्ग, धनाढ़य समुदाय का इससे कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन बिगड़ता है तो उस किसान का जिसने खून.पसीना एक कर गेहूँ पैदा किया थाए और बिगड़ता तो उस गरीब का  है जिसे ये गेहूँ नसीब होने वाले थे।

गोदामों में अनाजों का भण्डारण एवं स्थानान्तरण वर्षा ऋतु में नहीं करना चाहिएए भण्डारण उन राज्यों में करना चाहिए जहाँ गेहूँ का उत्पादन नहीं होता हो, या जो प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त नहीं रहते होंए एक ही स्थान पर अधिक भण्डारण की अपेक्षा कम-कम मात्रा में अनेक स्थानों पर भण्डारण करना चाहिए ताकि किसी अनहोनी में एक स्थान पर रखा कम अनाज ही प्रभावित हो। एक गोदाम में एक ही तरह के अनाज का भण्डारण करना चाहिएए प्रतिवर्ष पुराने अनाज का उचित वितरण कर नये अनाजों का भण्डारण करना चाहिए। चूहोंए फंगसए कीड़ों-मकोड़ों आदि से बचाने का समुचित प्रबन्ध होना चाहिएए गोदामों की एवं कर्मचारियों की पर्याप्त संख्या होनी चाहिएए भण्डारित अनाजों का समुचित वितरण होना चाहिए एवं अनाजों की कालाबाजारी पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए।

विश्व के तीन प्रमुख खाद्यान्नों चावल, गेहूँ व मक्का में गेहूँ का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि  ;g विश्व की अधिकांश सभ्य जातियों का मुख्य खाद्यान्न है। भारत में भी कुल खाद्यान्नों का 36 प्रतिशत भाग गेहूँ का है जो चावल के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत की लगभग 30 प्रतिशत जनसंख्या का जीवन गेहूँ पर निर्भर है। भारत विश्व में जनसंख्या एवं गेहूँ उत्पादन दोनों की दृष्टि से दwसरे स्थान पर है लेकिन भारत में विश्व की 16.87 प्रतिशत जनसंख्या है जबकि गेहूँ उत्पादन विश्व का मात्र 11.6 प्रतिशत है। अतः स्पष्ट है कि जितनी मात्रा में गेहूँ चाहिए उतनी मात्रा में उत्पादन नहीं हो रहा है

गोदामों में गेहूँ के भण्डारण का प्रमुख उद्देश्य यही है कि अकाल, युद्ध, अतिवृष्टि, अनावृष्टि या अन्य किसी आपातकालीन स्थिति में गेहूँ की जरूरत पड़ने पर सम्बन्धित क्षेत्र में कम कीमत पर आसानी से गेहूँ उपलब्ध करवाया जा सके, जिससे कीमतें भी ना बढ़ेa और जनता को समस्याओं का सामना भी ना करना पड़े।

सरकार को गोदामों की समस्याओं पर भी ध्यान देना चाहिए। विशाल मात्रा में पैदा होने वाले अनाज के भण्डारण हेतु गोदामों की कमी, गोदामों में पर्याप्त स्थान एवं कर्मचारियों की कमी, चूहों, फंगस, कीड़े-मकोड़े से हानि की समस्या, एक ही गोदाम में विभिन्न अनाजों का एक साथ भण्डारण करना, अधिकांश भण्डारण उत्पादन वाले क्षेत्रों में ही करना, गोदामों एवं भण्डारित अनाजों की पर्याप्त देखभाल का अभाव आदि समस्याओं के चलते अनाजों का सुरक्षित भण्डारण करना मुश्किल है। अतः सरकार को इन सभी समस्याओं पर ध्यान देकर इन्हें दूर करना चाहिए। किसी भी कीमत पर गेहूँ की बर्बादी रोकनी होगी ताकि 150 करोड़ भारतीय जनता को खाद्य सुरक्षा प्राप्त हो सके।

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